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________________ कृष्टि १४१ कृष्टि अपनेसे अगलियोमें संक्रमण कर दी गयी हैं।४१७। अनुभागकी अपेक्षा १२ संग्रह कृष्टियोमें लोभकी प्रथम अन्तरकृष्टिसे क्रोधकी अन्तिम अन्तरकृष्टि पर्यन्त अनन्त गुणित क्रमसे (अन्तरकृष्टिका गुणकार स्वस्थान गुणकार है और संग्रहकृष्टिका गुणकार परस्थान गुणकार है जो स्वस्थान गुणकारसे अनन्तगुणा है-(दे० आगे कृष्टचन्तर) अनुभाग बढता बढ़ता हो है ।४६। द्रव्यकी अपेक्षा विभाग करनेपर क्रम उलटा हो जाता है। लोभकी जघन्य कृष्टिके द्रव्यतें लगाय क्रोधकी उत्कृष्ट कृष्टिका द्रव्य पर्यन्त (चय हानि) हीन क्रम लिये द्रव्य दीजिये ।५००। उपान्त कृष्टियों निचली कहलाती हैं। उदयके समय निचले निषेोंका उदय पहले आता है और ऊपरलोका बादमें । इसलिए अधिक अनुभाग युक्त प्रथमादि कृष्टिये नीचे रखी जाती हैं, और हीन अनुभाग युक्त आगेकी कृष्टिये ऊपर । अत. वही प्रथमादि ऊपर वाली कृष्टिये यहाँ नीचे वाली हो जाती है और नीचे वाली कृष्टिये ऊपरवाली बन जाती है। ५. कृष्टयन्तर क्ष.सा./388/भाषा-संज्वलन चतुष्ककी १२ संग्रह कृष्टियाँ हैं। इन १२ को पंक्तिके मध्य में ११ अन्तराल है। प्रत्येक अन्तरालका कारण परस्थान गुणकार है। एक संग्रहकृष्टिकी सर्व अन्तर कृष्टियाँ सर्वत्र एक गुणकारसे गुणित है। यह स्वस्थान गुणकार है। प्रथम संग्रहकृष्टिको अन्तिम अन्तरकृष्टिसे द्वितीय संग्रहकृष्टिको प्रथम अन्तरकृष्टिका अनुभाग अनन्तगुणा है। यह गुणकार पहलेवाले स्वस्थान गुणकारसे अनन्तगुणा है। यहो परस्थान गुणकार है। स्वस्थान गुणकारसे अन्तरकृष्टियोका अन्तर प्राप्त होता है और परस्थान गुणकारसे संग्रहकृष्टिका अन्तर प्राप्त होता है। कारणमें कार्यका उपचार करके गुणकारका नाम ही अन्तर है। जैतै अन्तराल होइ तितनी बार गुणकार होइ। तहाँ स्वस्थान गुणकारनिका नाम कृष्टयन्तर है और परस्थान गुणकारनिका नाम संग्रहकृष्टान्तर है। ८. कृष्टिकरण विधानमें अपकृष्ट द्रव्यका विभाजन १. कृष्टि द्रव्य.-क्ष.सा./५०३/ भाषा-द्वितीयादि समयनिविषै समय समय प्रति असख्यात गुणा द्रव्यको पूर्व अपूर्व स्पर्धक सम्बन्धी द्रव्यतै अपकर्षण कर है। उसमेसे कुछ द्रव्य तो पूर्व अपूर्व स्पर्धक को ही देवै है और शेष द्रव्यकी कृष्टिय करता है । इस द्रव्यको कृष्टि सम्बन्धी द्रव्य कहते है। इस द्रव्यमें चार विभाग होते हैं-अधस्तन शीर्ष द्रव्य, अधस्तन कृष्टि द्रव्य, मध्य खण्ड द्रव्य, उभय द्रव्य विशेष । २. अधस्तन शीर्ष द्रव्यः-पूर्व पूर्व समय विषै करि कृष्टि तिनि विषै प्रथम कृष्टितै लगाय (द्रव्य प्रमाणका) विशेष घटता क्रम है। सो पूर्व पूर्व कृष्टिनिको आदि कृष्टि समान करनेके अर्थ घटे विशेषनिका द्रव्यमात्र जो द्रव्य तहां पूर्व कृष्टियो में दीजिए बह अधस्तन शीर्ष विशेष द्रव्य है। ३. अधस्तन कृष्टि द्रव्य'-अपूर्व कृष्टियोंके द्रव्यको भी पूर्व कृष्टियोंकी आदि कृष्टिके समान करनेके अर्थ जो द्रव्य दिया सो अधस्तन कृष्टि ६. पूर्व, अपूर्व, अधस्तन व पार्श्वकृष्टि कृष्टिकरणकी अपेक्षा क्ष. सा./५०२ भाषा-पूर्व समय विषै जे पूर्वोक्त कृष्टि करी थी (दे० संग्रहकृष्टि व अन्तरकृष्टि) तिनि विषै १२ संग्रहकृष्टिनिकी जे जघन्य ( अन्तर ) कृष्टि, तिनत (भो) अनन्तगुणा घटता अनुभाग लिये, (ताकै ) नीचे केतीक नवीन कृष्टि अपूर्व शक्ति लिये युक्त करिए है । याही ते इसका नाम अधस्तन कृष्टि जानना । भावार्थजो पहलेसे प्राप्त न हो बल्कि नवीन की जाये उसे अपूर्व कहते है। कृष्टिकरण कालके प्रथम समयमें जो कृष्टियों की गयीं वे तो पूर्वकृष्टि हैं। परन्तु द्वितीय समयमें जो कृष्टि की गयीं वे अपूर्व कृष्टि हैं, क्योंकि इनमें प्राप्त जो उत्कृष्ट अनुभाग है वह पूर्व कृष्टियो के जघन्य अनुभागसे भी अनन्तगुणा घटता है। अपूर्व अनुभागके कारण इसका नाम अपूर्व कृष्टि है और पूर्वकी जघन्य कृष्टिके नीचे बनायी जानेके कारण इसका नाम अधस्तनकृष्टि है । पूर्व समय विषै करी जो कृष्टि, तिनिके समान ही अनुभाग लिये जो नवीन कृष्टि, द्वितीयादि समयोंमे की जाती है वे पार्श्व कृष्टि कहलाती हैं, क्योकि समान होनेके कारण पंक्ति विषै, पूर्वकृष्टिके पार्श्वमें ही उनका स्थान है। ७. अधस्तन व उपरितन कृष्टि कृष्टि वेदनकी अपेक्षा क्ष.सा./५१५/भाषा-प्रथम द्वितीयादि कृष्टि तिनको निचली कृष्टि कहिये । बहुरि अन्त, उपान्त आदि जो कृष्टि तिनिको ऊपरली कृष्टि कहिये। क्योकि कृष्टिकरणसे कृष्टिवेदनका क्रम उलटा है। कृष्टिकरणमें अधिक अनुभाग युक्त ऊपरली कृष्टियो के नीचे हीन अनुभाग युक्त नवीन-नवीन कृष्टियाँ रची जाती हैं। इसलिए प्रथमादि कृष्टियाँ ऊपरली और अन्त ४. उभय द्रव्य विशेष'-पूर्व पूर्व कृष्टियों को समान कर लेनेके पश्चाव अब उनमें स्पर्धकोकी भॉति पुनः नया विशेष हानि उत्पन्न करनेके अर्थ जो द्रव्य पूर्व व अपूर्व दोनों कृष्टियों को दिया उसे उभय द्रव्य विशेष कहते है। ५. मध्य खण्ड द्रव्य'-इन तीनों की जुदा किये अवशेष जो द्रव्य रहा ताको सर्व कृष्टिनि विषै समानरूप दीजिए, ताकी मध्यखण्ड द्रव्य कहते हैं। इस प्रकारके द्रव्य विभाजनमें २३ उष्ट्रकूट रचना होती है। ९. उष्ट्र कूट रचना क्ष.सा./५०५/भाषा-जैसे ऊँटकी पीठ पिछाडी तौ ऊँची और मथ्य बिषै नीची और आगै ऊँची और नीची हो है तैसे इहाँ (कृष्टियोंमें अपकृष्ट द्रव्यका विभाजन करनेके क्रममें) पहले नवीन (अपूर्व) जघन्य कृष्टि विषै बहुत, बहुरि द्वितीयादि नवीन कृष्टिनि विषै क्रम घटता द्रव्य दै हैं। आगे पुरातन (पूर्व) कृष्टिनि विषै अधस्तन शीर्ष विशेष द्रव्य कर बँधता और अधस्तन कृष्टि द्रव्य अथवा उभय द्रव्य विशेषकरि घटता द्रव्य दीजिये है। तातै देयमान द्रव्यविषै २३ उष्ट्रकूट रचना हो है। (चारों कषायों में प्रत्येककी तीन इस प्रकार पूर्व कृष्टि १२ प्रथम संग्रहके बिना नवीन संग्रह कृष्टि ११) । १०. दृश्यमान द्रव्य क्ष.सा./५०५] भाषा-नवीन अपूर्व कृष्टि विषै तौ विवक्षित समय विषै दिया गया देय दव्य ही दृश्ययान है, क्योंकि, इससे पहले अन्य द्रव्य तहाँ दिया ही नहीं गया है, और पुरातन कृष्टिनिविर्षे पूर्व समयनिविषै दिया द्रव्य और विवक्षित समय विर्षे दिया द्रव्य मिलाये दृश्यमान द्रव्य हो है। ११. स्थिति बन्धापसरण व स्थिति सत्वापसरण क्ष.सा/५०६-५०७/भाषा-अश्वकर्ण कालके अन्तिम समय संज्वलन चतुष्क का स्थिति बन्ध आठ वर्ष प्रमाण था। अब कृष्टिकरणके अन्तर्मुहूर्तकाल पर्यन्त बराबर स्थिति बन्धापसरण होते रहनेके कारण वह घटकर जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016009
Book TitleJainendra Siddhanta kosha Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2002
Total Pages648
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
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