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________________ દેશી નામમાલા ૯ हेमने उपर्युक्त प्रतिज्ञावाक्य में बताया है कि जो व्याकरण से सिद्ध न हो, वे देशी शब्द हैं और इस कोश में इस प्रकार के देशी शब्दों के संकलन की प्रतिज्ञा की गयी है; किन्तु इस कोश में लगभग एक तिहाई इस प्रकार के शब्द है, जिनकी व्युत्पत्तियां व्याकरण के नियमों के आधार पर सिद्ध की जा सकती है । अमयनिग्गम - अमृतनिर्गम शब्द चन्द्रमा का वाचक माना है । इस शब्द की व्युत्पत्ति व्याकरण से सिद्ध है, पर संस्कृत कोशों में इस शब्द को अनिबद्ध रहने के कारण ही यहां इसे देशी कहा है । इसी प्रकार अन्भपिसायअभ्रपिशाच, पुरिल्लदेवो - पूर्वदेव, बंभणी-ब्राह्मणी, गहवई - गृहपति आदि अनेक शब्द हैं । इस कोश में ऐसे भी शब्दों का संकलन है, जिन का अर्थ लक्षणा शक्ति के द्वारा सिद्ध होता है; जैसे गोसण्णो शब्द मूर्ख के अर्थ में संगृहीत है, इसका संस्कृत रूप गोसंज्ञ है, यह बलीवर्द के समान लक्षणाशक्ति द्वारा ही मूर्ख अर्थ का द्योतन करता है । अतः स्पष्ट है कि हेम ने इस कोश के संकलन में अपने प्रतिज्ञावाक्य का पूरी तरह निर्वाह नहीं किया है । देशी नाममाला में ३९७८ शब्द संगृहीत है । इन का विवरण निम्न प्रकार है तत्सम शब्द - जिन की ध्वनियां संस्कृत शब्दों के समान हैंगर्भित तद्भव - वर्षागम, वर्णविकार आदि से विकृत - १०० १८५० ५२८ १५०० इस कोश की रचना वर्णक्रम के आधार पर की गई है । यह स्वरवर्ग, क वर्ग, च वर्ग, टवर्ग, वर्ग, पवर्ग, य वर्ग और स वर्ग इन आठ अध्यायों में विभक्त है । इस में कुल ७८३ गाथाएँ हैं । जिस प्रकार धनपाल कवि की पाइअलच्छी नाममाला प्राकृत के आरम्भिक अभ्यासिओं के लिए उपयोगी है। उसी प्रकार यह प्राकृत के प्रौढ अभ्यासियों के लिये उपयोगी है । इस कोश की निम्न पांच विशेषताएँ हैं— संशययुक्त तद्भव - खींचतानकर जिन की व्युत्पत्ति सिद्ध की जाय अव्युत्पादित प्राकृत शब्द (१) साहित्यिक सुन्दर उदाहरणों का संकलन | (२) संकलित शब्दों का आधुनिक देशी भाषाओं के साथ सम्बन्ध | (३) ऐसे शब्दों का संकलन, जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । (४) ऐसे शब्दों का संकलन, जिन के आधार पर उस काल के रहन सहन और रीति रिवाज का यथेष्ट परिज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । (५) परिवर्तित अर्थवाले ऐसे शब्दों का संकलन, जो सांस्कृतिक इतिहास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण, उपयोगी और उपादेय हैं । कोशकारने कोशगत शब्दों के अर्थ को हृदयंगम करने के लिए कुछ सरस गाथाएँ उदाहरण स्वरूप उपस्थित की हैं। यह अभीतक विवादास्पद है कि इन गाथाओं का रचयिता कौन है । शैली और शब्दों के उदाहरणों को देखने से ज्ञात होता है कि इन गाथाओं के रचयिता आचार्य हेम ही हैं । इन गाथाओं का साहित्यिक मूल्य अत्यधिक है । सरसता, भाव और कलागत सौन्दर्य की २ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012077
Book TitleMohanlalji Arddhshatabdi Smarak Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMrugendramuni
PublisherMohanlalji Arddhashtabdi Smarak Granth Prakashan Samiti
Publication Year1964
Total Pages366
LanguageHindi, Gujarati, English
ClassificationSmruti_Granth
File Size13 MB
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