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________________ महाराज श्री मजदूरों की पारिवारिक समस्याओं में विशेष रुचि लिया करते थे और उनकी तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज के सम्पन्न व्यक्तियों को विशेष प्रेरणा दिया करते थे। अनेक मजदूर उनकी उदार कृपा-दृष्टि का समय-समय पर लाभ उठाया करते थे। महाराज श्री में एक अद्भुत कुशल संगठन-क्षमता है। उन्होंने अपने संरक्षण में लगभग ५०० बालकों की सेवक टोली तैयार कर ली थी। टोली के छोटे-छोटे बालक नीचे से सामान व जल इत्यादि लाने में सहायता किया करते थे । आचार्य श्री ने जब जयपुर से विहार किया, उस समय खानिया जी में काम करने वाले मजदूर एवं श्रावक बालकों ने भाव-विह्वल होकर अश्रुपूरित नेत्रों से महाराज श्री को विदा किया। उस समय खानियाजी के पहाड़ पर वास्तव में करुणा की गंगा ही प्रवाहित हो उठी थी। महाराज श्री स्वयं उस करुणा के समुद्र से अभिभूत हो गये थे। किन्तु एक तत्वदर्शी के रूप में सभी का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने कहा कि दिगम्बर साधु का एक स्थान पर रहना प्रायः कठिन है, इसलिए विहार करना तो परमावश्यक-सा है। किन्तु, आप सब लोग अपने धर्म का पालन करते हुए जीवन को व्यतीत करें, यही हमारी संबोधना है । यह सब आप की कृपा और प्रताप के फलस्वरूप है। आपके सान्निध्य में इसके लिए बुद्धि भी मिली है, धैर्य भी और क्षमता भी। ऐसे कल्याणकारक सद्गुरु युग-युगों तक चिरजीवी रहें, धर्म का प्रचार करते रहें, अज्ञानियों को सद्बुद्धि प्रदान करते रहेंइसी कामना के साथ आपके चरणों में शत-शत नमन और श्रद्धांजलि समर्पित है । भारत की शोभा क्षुल्लिका कीर्तिमति जी परम पूज्य गुरुवर्य आचार्यरत्न श्री १०८ परम तपस्वी देशभषग जी महाराज त्रिकाल वन्दनीय, प्रातः स्मरणीय, तपोनिष्ठ, चारित्रश्रेष्ठ, भव्यजन उद्धारक, करुणासागर, सद्धर्मवृद्धिकारक, मिथ्यत्वदूषण विध्वंसक, संयमविभूषण-विभूषित, सन्मार्ग प्रकाशक, मुनिधर्म प्रवर्तक, जिनवाणी कंठोद्गत, रत्नत्रयालंकृत ज्ञान-दिवाकर हैं। ऐसे गुरुदेव के चरण कमलों में मेरा विनीत होकर त्रिबार नमोऽस्तु । परम पूज्य गुरुदेव की महिमा अपार है। यथा नाम तथा गुण हैं। आपकी महिमा के लिए करोड़ों जिह्वा लगाई जाएँ तो भी अधूरी रहे। गुरु की महिमा वरनी न जाय, गुरु नाम जपो मन वचन काय । जिस प्रकार रत्नों में हीरा श्रेष्ठ है, सुगन्धित द्रव्यों में कस्तूरी श्रेष्ठ है, पेड़ों में कल्पवृक्ष श्रेष्ठ है, पर्वतों में मेरु पर्वत श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सब मानवों में आचार्यरत्न श्री देशभूषण महाराज श्रेष्ठ हैं। दिन की शोभा सूर्य से है, रात्रि की शोभा चन्द्रमा से है, कुल की शोभा सत्सुत्र से है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भारत की शोभा आचार्य देशभूषण महाराज जी से है। ऐसे गुरुदेव के लिए ही कहा गया है उन गुरुवर के चरण में, नमन अनन्ते बार। मुक्ति पथ दर्शाय के, से भव करते पार ।। सिद्ध परुष ब्र० कुसुमबाई जैन परम पूज्य, प्रातःस्मरमीय, विद्यालंकार, भारतगौरव, धर्मनेता, बालब्रह्मचारी, तपोनिधि, उपसर्गविजयी, धर्मदिवाकर आचार्यरत्न श्री १०८ देशभूषण जी महराज एक साहसी धैर्यवान् नित्योद्योगी हैं । आपने अपने जीवन में धर्म के निमित्त नाना स्थानों पर अनेक प्रकार के उपसर्गों को सहन कर जैनधर्म का डंका बजाया है। आपके उपदेश द्वारा अनेक सामाजिक कार्य हुए हैं। हम नहीं जान पाते कि महाराज जी को अवधिज्ञान है या कोई ऋद्धिसिद्धि, जिसमें जो कुछ कह देते हैं वह कार्य तुरन्त ही फलवान् बन जाता है। यह हमारे द्वारा प्रत्यक्ष में अनुभव किया हुआ है । आपने भारत के कोने-कोने में विहार कर जैन समाज को जागृत किया है। आप उच्च कोटि के धैर्यवान् तपस्वी हैं, और निरन्तर ध्यानाध्यायन में संलग्न रहते हैं। आप एक ऐसे महान् आध्यात्मिक सन्त हैं कि आपके दर्शन मात्र से और उपदेश श्रवण से भव्य जीवों के मन में स्थित संशय नष्ट हो जाते हैं। आपको मेरा नमोऽस्तु । कालजयी व्यक्तित्व Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012045
Book TitleDeshbhushanji Aacharya Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorR C Gupta
PublisherDeshbhushanji Maharaj Trust
Publication Year1987
Total Pages1766
LanguageHindi, English
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size56 MB
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