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- यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य दुसरे बृहत्कल्प-लघुभाष्य तथा पंचकल्प-महाभाष्य के प्रणेता। के प्रणेता, जिनका नाम अभी तक अज्ञात है, बृहत्कल्पचूर्णिकार ये दोनों आचार्य एक न होकर भिन्न-भिन्न हैं, क्योंकि वसुदेवहिंडि- तथा बृहत्कल्पविशेषचूर्णिकार से भी पीछे हुए हैं। इसका कारण मध्यम खण्ड के कर्ता आचार्य धर्मसेनगणि महत्तर के कथनानुसार यह है कि बृहत्कल्पलघुभाष्य की १६६१वीं गाथा में प्रतिलेखना वसुदेवहिंडि-प्रथम खंड के प्रणेता संघदासगणि 'वाचक' पद से के समय का निरूपण किया गया है। उसका व्याख्यान करते विभूषित थे, जबकि भाष्यप्रणेता संघदासगणि 'क्षमाश्रमण' हुए चूर्णिकार और विशेषचूर्णिकार ने जिन आदेशांतरों का अर्थात् पदालंकृत हैं।१० आचार्य जिनभद्र का परिचय देते समय हमने प्रतिलेखना के समय से संबंध रखने वाली विविध मान्यताओं देखा है कि केवल पदवी-भेद से व्यक्ति-भेद की कल्पना नहीं का उल्लेख किया है, उनसे भी और अधिक नई-नई मान्यताओं की जा सकती। एक ही व्यक्ति विविध समय में विविध पदवियाँ का संग्रह बृहत्कल्प-बृहद्भाष्यकार ने उपर्युक्त गाथा से संबंधित धारण कर सकता है। इतना ही नहीं, एक ही समय में एक ही महाभाष्य में किया है, जो याकिनीमहत्तरासूनु आचार्य श्री व्यक्ति के लिए विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न पदवियों का प्रयोग हरिभद्रसूरिविरचित पंचवस्तुक प्रकरण की स्वोपज्ञवृत्ति में उपलब्ध किया जा सकता है।
है। इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि बृहत्कल्प-बृहद्भाष्य के कभी-कभी तो कुछ पदवियाँ परस्पर पर्यायवाची भी बन
प्रणेता बृहत्कल्पचूर्णि तथा विशेषचूर्णि के प्रणेताओं से पीछे हुए जाती हैं। ऐसी दशा में केवल 'वाचक' और 'क्षमाश्रमण' पदवियों
हैं। ये आचार्य हरिभद्रसूरि के कुछ पूर्ववर्ती अथवा समकालीन के आधार पर यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि इन
हैं। अब रही बात व्यवहारभाष्य के प्रणेता की। इस बात का
र पदवियों को धारण करने वाले संघदासगणि भिन्न-भिन्न व्यक्ति
कहीं उल्लेख नहीं मिलता कि व्यवहारभाष्य के प्रणेता कौन हैं थे। मुनि श्री पुण्य विजयजी ने भाष्यकार तथा वसुदेवहिंडिकार ।
और वे कब हुए हैं? इतना होते हुए भी यह निश्चयपूर्वक कहा आचार्यों को भिन्न-भिन्न सिद्ध करने के लिए एक और हेतु दिया ।
जा सकता है कि व्यवहार-भाष्यकार जिनभद्र के भी पूर्ववर्ती है१२ है. जो विशेष बलवान है। आचार्य जिनभद्र ने अपने विशेषणवती
इसका प्रमाण यह है कि आचार्य जिनभद्र ने अपने विशेषणवती ग्रन्थ में वसुदेवहिंडि नामक ग्रन्थ का अनेक बार उल्लेख किया ।
ग्रन्थ, में व्यवहार के नाम के साथ जिस विषय का उल्लेख है। इतना ही नहीं अपितु वसुदेवहिंडि प्रथम खण्ड में चित्रित
किया है, वह व्यवहारसूत्र के छठे उद्देशक के भाष्य में उपलब्ध ऋषभदेव-चरित की संग्रहणी गाथाएँ बनाकर उनका अपने ग्रन्थ में
होता है।१३ इसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि समावेश भी किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वसुदेवहिंडि
व्यवहारभाष्यकार आचार्य जिनभद्र से भी पहले हुए हैं। प्रथम खण्ड के प्रणेता संघदागणि आचार्य जिनभद्र के पूर्ववर्ती
जैन साहित्य का वृहद इतिहास, हैं।१९ भाष्यकार संघदासगणि भी आचार्य जिनभद्र के पूर्ववर्ती ही हैं।
भाग ३ से साभार
अन्य भाष्यकार
सन्दर्भ आचार्य जिनभद्र और संघदासगणि को छोड़कर अन्य १. गणधरवाद : प्रस्तावना, पृ. २७-४५ भाष्यकारों के नाम का पता अभी तक नहीं लग पाया है। यह तो
२. विविधतीर्थकल्प, पृ. १९ निश्चित है कि इन दो भाष्यकारों के अतिरिक्त अन्य भाष्यकार भी हुए हैं, जिन्होंने व्यवहारभाष्य आदि की रचना की है। मनिश्री ३. जैन-सत्य-प्रकाश, अंक १९६ पुण्यविजयजी के मतानुसार कम से कम चार भाष्यकार तो हुए ४. वही ही हैं। उनका कथन है कि एक श्री जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण,
५. पं. श्री दलसुख मालवणिया ने इन शब्दों की मीमांसा इस प्रकार दूसेर श्री संघदासगणि क्षमाश्रमण, तीसरे व्यवहारभाष्य आदि के ।
की है"प्रारम्भ में 'वाचक' शब्द शास्त्र-विशारद के लिए विशेष प्रणेता और चौथे बृहत्कल्प बृहद्भाष्य आदि के रचयिता - इस
प्रचलित था।....आचार्य जिनभद्र का युग क्षमाश्रमणों का युग रहा प्रकार सामान्यतया चार आगमिक भाष्यकार हुए हैं। प्रथम दो
होगा , अतः सम्भव है कि उनके बाद के लेखकों ने उनके लिये भाष्यकारों के नाम तो हमें मालूम ही हैं। बृहत्कल्प-बृहद्भाष्य
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