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________________ 'પંચ દવે ફેવિય , જ્ઞાનયજી મહારાજ જમશતાલિદ प्रभाव से उसमें अनुभव और वीर्योल्लास की मात्रा बड़ती है, उसके परिणामों में शुद्धि आने लगती है। इसे जैन सिद्धान्त में काल - लब्धि कहते हैं। इसके बाद आगे बढ़ता हुआ आत्मा अपने पुरुषार्थ को प्रकट करता हुआ इतनी शुद्धि प्राप्त करता है जिसकी बदौलत बह राग-द्वेष की तीव्रतम दर्भर नन्यिको तोड़ने योग्य बन जाता है। मोह - कर्म की ७० कोटा कोटि सागरोपम ९ कोटा कोटि सागरोपम से कुछ अधिक की स्थिति को नष्ट कर डालता है। इस अज्ञानपूर्वक दुख संवेदनाजनित अति अल्प आत्म-शुद्धि को यथाप्रवृत्तिकरण कहा जाता है। लोक प्रकाश में कहा है यथा मिथो घर्षणात् ग्रावाणोऽदिनदो गत ः। स्यश्चित्राकृतयो ज्ञानशन्या अपि स्वभावतः॥ तथा यथाप्रवृत्तात्स्युरप्यनाभोग लक्षणात् । लघुस्थिति कर्माणो अन्तवो एत्रान्तारे च -लोक प्रकाश सर्ग ३ इसके बाद जब कुछ और भी अधिक आत्मशुद्धि तथा वीर्योल्लास की मात्रा बढ़ती है तब आत्मा उस राग द्वेष की ग्रन्थि को अपने प्रबल पुरूषार्थ द्वारा भेद डालता है । इस ग्रन्थि भेद की प्रक्रिया को अपूर्व करण कहा जाता है। "तीव्रधार पर शुकत्या पूर्वारव्यकरणेन हि आविष्कृत्य परं वीर्य ग्रन्थि भिन्दन्ति केचन ।। __ - लोक प्रकाश सर्ग ३ ग्रन्थि भेद का कार्य वडा ही टेढ़ा है। मोह राजा का प्रधान दुर्ग राग-द्वेष की ग्रन्थि पर अवलम्बित है। जिस प्रकार दर्ग ढह पड़ने पर राजा को शक्ति कमजोर हो जाती है इसी तरह रागद्वेष की तीव्रतम ग्रन्थि के छिन्नभिन्न होने पर मोह की शक्ति क्षीण हो जाती है। ग्रन्थिभेद होने से दर्शनमोह-शिथिल पड़ जाता है और दर्शन मोह के शिथिल पड़ते ही चारित्रम की शिथिलता का मार्ग भी खुल जाता है। ग्रन्थिभेद को प्रक्रिया में सफल होने वाले आत्मा का अभ्युदय निश्चित हो जाता है। इस क्रिया में जो उत्तीर्ण हो जाता है उसका संसार - सागर से बेडा पार ही समझना चाहिए। ग्रन्थिभेद के अवसर पर आत्मा और मोह का प्रबल संवर्ष होता है। एक तरफ आत्मा के शत्रु और मोह के प्रधान योद्धा, राग द्वेष अपने पूर्ण बल का प्रयोग करते हैं और दूसरी तरफ विकासोन्मुख आत्मा भी उनके प्रभाव को कम करने के लिए अपनी शक्ति का प्रयोग करता है। इस संघर्ष में कभी एक शक्ति जयलाभ करती है तो कभी दूसरी। अनेक आत्मा ऐसे होते हैं जो ग्रन्थि भेद के लिये किये गये इस संघर्ष में रागद्वेष के तीव्र प्रहारों से हार खाकर पीछे भाग जाते हैं। कई आत्मा ऐसे होते हैं जो न तो हार खाकर पीछे भागते हैं और न जयलाभ ही करते हैं, मैदान में जमे रहते हैं। कोई आत्मा ऐसे होते हैं जो रागद्वेष को अपने प्रबल पौरूष से परास्त कर विजयलाभ कर लेते हैं । जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए इन तीन प्रकार की स्थितियों का अनुभव होता रहता है। प्रत्येक कार्य में विघ्न आते हैं और उनसे संघर्ष करना ही पड़ता है। इस संघर्ष में कतिपय व्यक्ति हार खा जाते हैं तो वे लक्ष्य को प्राप्त नहीं करते और जो संघर्ष में पुरुषार्थ दिखाकर विषयी बनते हैं वे अपने इष्ट को प्राप्त कर ही लेते है। जो न हार खाते हैं और न प्रवल पुरुषार्थ ही प्रकट करते हैं ऐसे व्यक्ति बीच में झूला करते है । वे कोई उल्लेखनीय उत्कर्ष नहीं कर सकते। शास्त्र में इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण दिया गया है। तीन प्रवासी कहीं जा रहे थे । मार्ग में चोर मिले। चोरों को देखते ही एक तो भाग गया। दूसरा डर कर तो नहीं भागा परन्तु चोरों से पकड़ा गया। तीसरा व्यक्ति अपने बल पौरुष से चोरों को हराकर आगे बढ़ ही गया। इस दृष्टान्त से मानसिक विकारों के साथ होने वाले आध्यात्मिक युद्ध में प्राप्त होने वाले जय-पराजय को समझा जा सकता है। जो आत्मा इस संघर्ष में प्रबल पुरुषार्थ प्रकट कर रागद्वेष की ग्रन्थि को भेदने में सफल हो जाता है उसे वह अद्भुत आनन्द आता है जो पूर्व में कभी प्राप्त नहीं हुआ। इस अपूर्व स्थिति को अपूर्वकरण कहा जाता है। आत्मिक उत्क्रान्ति के सोपान ३५७. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012031
Book TitleNanchandji Maharaj Janma Shatabdi Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChunilalmuni
PublisherVardhaman Sthanakwasi Jain Shravak Sangh Matunga Mumbai
Publication Year
Total Pages856
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size26 MB
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