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सर्वतोमुखी व्यक्तित्व
धरती धोरां री
राजस्थान का मरुधर प्रान्त ! जहाँ आत्मीयता, उदारता और वीरता की पावन धारा बहती है सदा अविरल रूप में ! आन-बान और शान का प्रतीक ! 'धरती धोरां री !!
समाधिस्थ टीलें
भोर की पहली किरण जब निहारती है माटी के टीलों को तो चमकने लगते हैं, स्वर्ण-रजत सदृश ! घिर आती है रात, छिटकने लगती है चाँदनी छा जाती है नीरवता, लगते हैं जैसे टीले योगी-से समाधिस्थ है स्व में ! सांय-सांय की आवाज, झुंगुरों की रुनझुन,
और रात की गुन-गुन ही उस नीरवता को भले भंग करें !
महक माटीरी
माटी में महक कण-कण में सुवास ! लोगों में उपजाता विश्वास ! नेहभरी बदली की एक-एक सिकता मरूभूमि के कण-कण को है नहलाती !
अपनापन
छलकता-ढरकता नेह ! आतिथ्य का कोई ओर न छोर ! कितना अपनापन ! कितनी आत्मीयता !!
और है -कितना स्वाभिमान ! पा आतिथ्य हो जाता आनन्दित, मन-मयूर!
पर्याय : कठोरता एवं मृदुता का
अरावली की चट्टानें जिसकी रक्षा में सन्नद्ध ! मरुधरा एक ऐसा प्रांत जहाँ कठोरता भी है
और मृदुता भी है कठोरता है - अपनी मर्यादा, वचन एवं टेक निभाने में ! मृदुता है- व्यवहार में, वाणी में एवं आचरण में।
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