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________________ सिद्धान्तप्रन्थोंका अध्ययन किया था और तब जयधवला टीका लिखी थी। जयधवलामें उन्होंने अपने को अनेक जगह एलाचार्यका शिष्य कहा है। वीरसेन अपने समयके महान् जैनाचार्य थे। जिनसेनने उन्हें बादिमुख्य, लोकबित्, वाग्मी और कविके सिवाय श्रुतकेवली तुल्य लिखा है और कहा है कि उनकी सर्वार्थगामिनी प्रज्ञाको देखकर बुद्धिमानोंको सर्वज्ञकी सत्ता में कोई शंका नहीं रही । गुणभद्रने उन्हें समस्त वादियोंको त्रस्त करनेवाला और उनके शरीरको ज्ञान और चारित्रकी सामग्रीसे बना हुआ कहा है। arrer arata samा और जयधवला टीकाकी रचना की थी । इन्हें ही धवल और जयधवल सिद्धान्त ग्रन्थ कहा जाता है । जयधवला टीकाका एक तिहाई भाग तो वीरसेनकृत है, शेष भाग जिनसेनकृत है । जिनसेन के सम्बन्ध में गुणभद्रने कहा है कि जिसतरह हिमालय से गंगाका, सर्वज्ञके मुखसे दिव्यध्वनिका और उदयाचल से भास्करका उदय होता है उसी तरह वीरसेनसे जिनसेनका उदय हुआ । जिनसेन सिद्धान्तके तो ज्ञाता थे ही, उच्चकोटि के कवि भी थे | जयवलाके शेष भागके सिवाय उनके दो ग्रन्थ और भी उपलब्ध हैं, एक पाश्वभ्युदय काव्य और दूसरा आदिपुराण | आदिपुराण में ४७ पर्व हैं। उनमें से ४२ पर्व जिनसेनके शेष उनके शिष्य गुणभद्रके हैं। गुणभद्र भी बहुत बड़े ग्रन्थकार थे । उन्होंने आदिपुराण की पूर्ति करने के बाद उत्तरपुराणकी रचना की । उत्तरपुराण संक्षिप्त है । उसमें शेष तेईस तीर्थकरों और महापुरुषों का चरित वर्णित है । गुणभद्रकी दूसरी रचना आत्मानुशासन है । यह छोटासा ग्रन्थ आत्मा पर अनुशासन प्राप्त करनेके लिये बहुत ही उत्तम साधन है। इसकी रचनाशैली भर्तृहरि वैराग्यशतक ढंगकी है। एक एक पद्य अनमोल है । इन तीन महान ग्रन्थकर्ताओं के समय में राष्ट्रकूटवंशके तीन महान् राजाओंका राज्य रहा, जगतुंगदेव, अमोघवर्ष और अकालवर्ष । अमोघवर्षकी जैनधर्मके प्रति बहुत सहानुभूति थी । शाकटायनने अपने व्याकरणकी टीकाका नाम अमोघवृत्ति रखा और उन्होंके नामसे वीरसेनजिनसेनने अपनी टीकाओंके नाम धवला जयधवला रक्खे। जिनसेनने उनकी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि अमोघवर्षकी कीर्तिक सामने गुप्तनरेशकी कीर्ति गुप्त और शककी कीर्ति मच्छरके तुल्य है । अमोघवर्ष जिनसेनका महान् भक्त था । आचार्य अमृतचन्द्र आध्यात्मिक विद्वानोंमें कुन्दकुन्द के बाद यदि किसीका नाम लिया जा सकता है तो अमृतचन्द्र हैं। उनकी गुरु-शिष्य परम्परा अज्ञात है। अपने प्रन्थोंके अन्तमें वे कहते हैंवर्णों से पढ़ वन गये, पदोंसे वाक्य बन गये और वाक्योंसे पवित्र शास्त्र बन गये। मैंने कुछ भी नहीं किया। इससे अधिक परिचय देनेकी उन्होंने आवशकता नहीं समझी। उनके बनाये हुए पांच ग्रन्थ उपलब्ध हैं- पुरुषार्थसिद्धयुपाय, तस्वार्थसार और समयसार, प्रवचनसार तथा पश्चास्तिकायकी टीकाएं। पहला श्रावकाचार है जो उपलब्ध तमाम भाषकाचारोंसे निराला और फ्र 이
SR No.011511
Book TitleKanjiswami Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchandra Jain Shastri, Himmatlal Jethalal Shah, Khimchand Jethalal Shah, Harilal Jain
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year1964
Total Pages195
LanguageGujarati
ClassificationSmruti_Granth
File Size16 MB
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