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________________ श्रीमवीरविजयोपाध्याय कृत, कहे सेविये रे काई । ए गुरु विसवा वीसमनने नावेंरे । कांई ए संसारर्नु उख फेरनहीं आवेरे ॥त॥ ७॥इति समाता ॥ ॥ अथ गुंहली॥ लघुवय जोग लीयोरे ॥ ए देशी॥ विजयानंदसूरिरायनारे । केतां करे वखाण गुरुजीये ज्ञान दियोरे। नव्य जीवप्रतिबोधवारे । मान उग्योनाण अघतम पूर कीयोरे ॥ गु॥१॥ पंचमहाव्रत पालतारे मालता निजगुण मांहि ॥7॥ परपदारथजालमारे गुरुजी पेसतानाहि ॥ २ ॥२॥ श्रध्यातमरसजीलतारे पीलतपापकरंग ॥ गु ॥ श्रनुजवज्ञानथी जाणा तारे मोह दशामहाफंद ॥7॥३॥अशुन योग निवारतारे करता करम निकंदाय॥ खपर सताजावतारे। चैतन्य जमनो संग ॥ गु॥४॥ वस्तुखजाव निहालतारे । एक अनेकनो रंग । नित्यानित्य विचा
SR No.010857
Book TitleChaturvinshati Jinstavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year
Total Pages216
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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