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________________ स्तवनावली. पास गुन गाया ॥ चिं ॥६॥ इति संपूर्ण ॥ ॥ अथ श्री अंबाला मंडन श्री सुपास जिन स्तवन ॥ क्युं नहो सुनाई खामी । ऐसा गुनाक्या कीया ॥ श्रांकणी ॥ औरोंकी सुनाई जावे । मेरीवारी नाही आवे ।तुम विनकौन मेरा मुजे क्युं जुलादिया। क्युं ॥१॥ जक्तजनो तारदीया तारवेका कामकीया । विनजक्ती वोला मोपें । पक्षपात क्यु लिया ॥ क्युं ॥॥ रावरंक एक जानो। मेरातेरा नाहीं मानो । तरन तारन ऐसा। विरुदधार क्युं लिया ॥ क्यु॥३॥ गुनामे रावतदिजे। मोपे एति रहेम कीजे । पकाहीचरोंसा तेरा । दिलोमें जमालिया । क्यु॥धा तुंही एक अंतर जामी । सुनो श्री सुपास खामी । अवतो आशा पुरो मेरी। कहेना सो तो केदीया ॥ क्युं ॥५॥
SR No.010857
Book TitleChaturvinshati Jinstavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year
Total Pages216
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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