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________________ सोमसेनभट्टारकविरचित ANNAPHAR आचमनं सदा कार्य स्नानेन रहितेऽपि च । आचमनयुतो देही जिनेन शौचवान्मतः ॥ ७७ ॥ स्नान न करने पर भी आचमन अवश्य करे । क्योंकि आचमनयुक्त प्राणीको श्रीजिनदेवने शुद्ध माना है ॥ ७७ ॥ सन्ध्याया लक्षणं मुद्रा आचमस्यापि लक्षणम् । कथयिष्यामि चाग्रेऽहं स्नानस्य विधिरुच्यते ॥ ७८ ॥ संध्या और आचमनका लक्षण तथा मुद्राओंको आगे चलकर कहेंगे । यहाँ अब स्नानकी विधि बताते हैं ॥ ७८॥ . तैलस्य मर्दनं चादौ कर्तव्यमन्यहस्तकैः । यथा सर्वाङशुद्धिः स्यात्पुष्टिश्चापि विशेषतः ।। ७९ ॥ स्नानके पहले दूसरेसे तैलका मालिश करावे । इससे सारे शरीरकी शुद्धि होती है तथा शरीर भी पुष्ट होता है ।। ७९ ॥ पात्रदानं स्वहस्तेन परहस्तेन मर्दनम् । तिलकं गुरुहस्तेन मातृहस्तेन भोजनम् ॥ ८० ॥: . पात्रोंको दान हमेशा अपने हाथसे दे, दूसरेके हाथसे तैलकी मालिश करावे, गुरुके हाथसे तिलक करावे और माताको परोसा भोजन करे ॥ ८०॥ तेलमर्दन विधि। अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पञ्चम्यामर्कवासरे । व्रतादीनां दिनेष्वेव न कुर्यात्तैलमर्दनम् ॥ ८१ ॥ अष्टमी, चतुर्दशी, पंचमी, रविवार और व्रतके दिनोंमें तेलकी मालिश न करे ॥ ८१ ॥ चरे विलने शशिजीवभौमे, रिक्तातिथौ स्यादुभये च पक्षे। तैलावलेपं तु मृदाविधृत्य (१) स्नानं नराणां विरुजत्वकारि ॥ ८२ ।। चरलग्न, सोमवार, बृहस्पति वार, दोनों पक्षोंकी रिक्त तिथि इन दिनोंमें तेल मालिश करके स्नान करना नीरोरोताका कारण है ।। ८२ ॥ हस्ते ऐन्द्रे च रेखत्यां सौम्ये चा पुनर्वसौ । स्नातो ब्रतान्वितो जीवो व्याधिना नैव बाध्यते ।। ८३ ॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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