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________________ : त्रैवर्णिकाचार । .. ३६.१ बताकर आहार लेना निमित्त दोष माना गया है । यह दोष इसलिए है कि ऐसा करनेमें रसास्वादन, दीनता आदि दोष पाये जाते हैं ॥ १०० ॥ वनीपक-दोप | पापंडिकृपणादीनामतिथीनां तु दानतः । पुण्यं भवेदिति मोच्य अद्याद्वरवनीपकम् ॥ १०१ ॥ . पाषंडी, कृपण आदि अतिथियोंको दान देनेसे पुण्य होता है ऐसा दान-दाताको कह कर आहार लेना बुनीपक- दोष है । भावार्थ- किसी दाताने पूछा कि महाराज | कुत्तोको रोटी डालने से, अन्धे, लूले, लंगड़े आदि दुःखी जीवोंको भोजन करानेसे, मधुमासादि भक्षण करनेवाले ब्राह्मणोंको तथा दीक्षाद्वारा उपजीवी पापडियोंको आहार देनेते तथा कौवों को खिलाने से पुण्य होता है या नहीं ? उत्तर में वे साधु कहें कि होता है । इसका नाम वनीपक- दोष है। तात्पर्य यह है कि दानपति अनुकूल वचन कहकर आहार लेना वनीपक-दोष हैं; क्योंकि ऐसा क कर आहार लेनेसे साधुओं में दीनता झलकती हैं ॥ १०१ ॥ जीवनक-दोप | जातिं कुलं तपः शिल्पकर्म निर्दिश्य चात्मनः । जीवनं कुरुतेऽत्यर्थ दोषो जीवनसञ्ज्ञकः ॥ १०२ ॥ अपनी जातिशुद्धि, कुलशुद्धि, तपश्चरण और शिल्पकर्मका निर्देश कर आजीविका करनों आहार ग्रहण करना जीवनक नामका दोष है। ऐसा करनेमें वीर्य निगूहन-शक्ति छिपाना, दीनता आदि दोष देखे जाते हैं; इसलिए यह दोप हैं ॥ १०२ ॥ कोदोष और लोभदोष | क्रोधं कृत्वाऽशनं ग्राह्यं क्रोधदोपस्ततो मतः । कचिल्लो प्रदर्श्यति लोभदोषः स कथ्यते ॥ १०३ ॥ क्रोध करके अपने लिए भिक्षा उत्पन्न करना क्रोधदोष है । तथा लोभं दिखाकर भिक्षा उत्पन्न करना लोभदोष है ॥ १०३ ॥ 'पूर्वस्तुति और पथात्स्तुति दोप । त्वमिन्द्र चन्द्र इत्युक्त्वा मुक्तेनं स्तुतिदोषभाक् । पूर्व भुंक्तं स्यात्पश्चात्स्तुतिपश्चान्मलो मतः ॥ १०४ ॥ तुम बड़े इंद्र हो, चन्द्र हो इत्यादि प्रथम स्तुतिकर पश्चात् आहार ग्रहण करना पूर्वस्तुति दोष हैं। तथा प्रथम आहार लेकर पश्चात्स्तुति करना पश्चात्स्तुति दोष है । भावार्थ-दातासे दान ग्रहण करनेके पहले ही कहना कि तुम बड़े भारी दान-दाता हो, तुम यशोधर हो, तुम्हारी कीर्ति जगतमें चारों ओर सुनाई दे रही हैं सो यह पूर्वस्तुतिदोष है । तुम पहले भारी दान-दाता थे, अब .. तुम दान देना कैसे भूल गये इस तरह संबोधित करके भी आहार लेना पूर्वस्तुतिदोप है। तथा दान 'लेकर पश्चात् गुणगान करना कि तुम जगतमें विख्यात हो, भारी दानपति हो, तुम्हारा यश हमने सुन रक्ला है सो पश्चात् स्तुतिदोष है। ऐसा करना नमाचार्यके कर्तव्यमें दोप है। तथा इससे कृपणता मालूम पड़ती है; अतएव ये दोनों दोष हैं ॥ १०४ ॥ ....
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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