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________________ सोमसेनभट्टारकविरचित विद्वान् और सदाचारी वरको स्वयं बुलाकर उसको और कन्याको बहुमूल्य आभूषण पहना कर कन्या देने को ब्राह्मविवाह कहते हैं ॥ ७१ ॥ ३१८ दैव-विवाह । यज्ञे तु वितते सम्यक जनार्चाकर्म कुर्वते । अलंकृत्य सुतादानं देवो धर्मः प्रचक्ष्यते ॥ ७२ ॥ जिन-पूजारूप महान अनुष्ठानका प्रारंभकर उसकी समाप्ति होनेपर उस जिनाच करानेवाले साधमीको वस्त्र - आभूषणोंसे विभूषित कर कन्या देनको दैवविवाहं कहते हैं ॥ ७२॥ आर्ष विवाह | एकं वैस्त्रयुगं द्वे वा चरादादाय धर्मतः । कन्याप्रदानं विधिवदाप धर्मः स उच्यते ॥ ७३ ॥ एक या दो जोड़ी वस्त्र वरसे कन्याको देनेके लिए धर्मनिमित्त लेकर विधिपूर्वक कन्या देना विवाह है ॥ ७३ ॥ प्राजापत्य विवाह | सहोभौ चरतां धर्ममिति तं चानुभाष्य तु । कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यां विधिः स्मृतः ॥ ७४ ॥ 6 कन्या प्रदानके समय तुम दोनों साथ साथ सद्धर्मका आचरण करो वस्त्राभूषण से सुसजित कर कन्या देने को प्राजापत्यविवाह कहते हैं ॥ आसुर विवाह । ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्यायै चैव शक्तितः । कन्यादानं यत्क्रियते चासुरो धर्म उच्यते ॥ ७५ ॥ कन्याके पिता आदिको कन्या के लिए यथाशक्ति धन देकर कन्या लेना सो आसुरविवाह है ॥ ७५ ॥ ऐसे वचन कहकर ७४ ॥ गान्धर्व विवाह | स्वच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च । गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ ७६ ॥ १ स ब्राह्म विवाहो यत्रं वरायालङ्कृत्य कन्या प्रदीयते । २ स देवो विवाहो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा । ३ 'वस्त्रयुगं' के स्थान में ' गोमिथुनं ' भी पाठ है, जिसका अर्थ एक गाय और एक बैल होता है । वरसे लेकर कन्याको देना या कन्याके साथ साथ एक या दो गोमिथुन देना, ये दोनों ही अर्थ स्वीकार किये गए हैं । तदुक्तं - गोमिथुनपुरःसरं कन्यादानादाषः । ४ विनियोगेन कन्याप्रदानात्प्राजापत्यः । त्वं भव अस्य महाभाग्यस्य सधर्मचारिणीति विनियोगः । ५. पणबंधेन कन्याप्रदानादासुरः ।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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