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. त्रैवर्णिकाचार। व्रतधारी पुरुपोंमें अग्रेसर गणधरादि देव, दिशाओंकी मर्यादाके भीतर भीतर प्रयोजन रहित पापके कारणोंसे विरक्त होनेको अनर्थदण्ड-विरति त कहते हैं ।। ९२ ॥
__ अनर्थदण्डव्रतके पांच भेद । पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च ।
पाहुः प्रमादचयोमनर्थदण्डानदण्डधराः ।। ९३ ॥ प्रयोजनरहित कार्योंको न करनेवाले पुरुष, पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और प्रमादचर्या, इन पांचको अनर्थदण्ड कहते हैं। भावार्थ-इन पांच कामोंको करना अनर्थदण्ड है ॥ ९३ ॥
पापोपदेश। तिर्यक्लेशवणिज्याहिंसारम्भगलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसङ्गमसवः स्मर्तव्यः पाप उपदेशः ॥ ९४ ॥ तिर्यग्वणिज्या, क्लेशवणिज्या, हिंसा, आरंभ, प्रलंभन (ठगाई) आदि कथाओंके प्रसंग उठाने को पापोपदेश नामा अनर्थदण्ड कहते हैं ॥ ९४ ॥
हिंसा-दान। परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधशृङ्गशृङ्खलादीनाम् ।
वधहतूनां दानं हिंसादानं ब्रुवन्ति बुधाः ॥ ९५ ।। फरसा, तलवार, कुदाली, अग्नि, आयुध, सींग, शांकल आदि हिंसाके कारणोंके देने को बुद्धि मान पुरुप, दिसादान नामा अनर्थदण्ड कहते हैं ॥ ९५ ॥
अपध्यान । वधवन्धच्छेदादे१पाद्रागाच्च परकलबादेः ।
आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः॥९६॥ . : __द्वेप तथा रागसे दुसरेकी स्त्री, पुत्र आदिके मरजाने, बँध जाने, कट जाने आदिका चिन्तवम करनेको जिन-शासनमें कुशल पुरुप अपध्यान नामा अनर्थदण्ड कहते हैं ।। ९६ ॥ .
दुःश्रुति । आरम्भसगसाहसमिथ्यात्वद्वेपरागमदमदनैः। ...
चेतः कलुपयतां श्रुतिरवधीनां दुःश्रुतिर्भवति ।। ९७ ।। . . . आरंभ, परिग्रह, साहस, मिथ्यात्व, द्वेष, राग, मद और मदन (काम) द्वारा चिसको मलिन करनेवाले शास्त्रोंका सुनना दुःश्रुति नामा अनर्थदण्ड है ॥ ९७ ।।
प्रमादचर्या । क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् । ..
सरणं सारणमपि च प्रमादचयाँ प्रभाषन्ते ॥ ९८॥ विना प्रयोजन जमीन खोदना, पानी उछालेना, अग्नि जलाना,हवा करना, वनस्पती तोड़ना, घूमना और औरोंको घुमाना, इन सबको प्रमादचर्या नामा अनर्थदण्ड कहते हैं ।। ९८॥