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________________ त्रैवर्णिकाचार १५९ पत्थर के टुकडोंसे उस गढ़ेकां पूरकर उसे पहली जमीनके बराबर समतल कर दे। इस प्रकार लोक व्यवहार और वास्तुशास्त्रको जाननेवाला गिरस्त दिशाओंका विचार कर जिनमन्दिर बनवाना आरंभ करे || १३|| १४ ॥ प्रतिष्ठादिषु शास्त्रेषु यदुक्तं गेहलक्षणम् । तेन मार्गेण संस्कुर्याजिनागारं शुभावहम् ॥ १५ ॥ प्रतिष्ठादिशास्त्रों में जो मकान बनवानेका लक्षण कहा गया है उसीके अनुसार शुभको देनेवाला जिनमन्दिर बनवावे ॥१५॥ मूलेषु पारदं क्षिप्त्वा श्रीखण्डं कुंकुमं तथा । प्रथमं स्थापयेद्गर्भे कोणेषु च चतुष्टयम् ॥ १६ ॥ तेषामुपरि संस्थाप्य शिलाः पञ्च यथाक्रमम् । पृथद्मन्त्रैश्च सम्पूज्य पञ्चानां परमेष्ठिनाम् ॥ १७ ॥ दानं ततादियुक्तानां दत्वा सन्मानपूर्वकम् । सर्वविघ्नोपशान्त्यर्थं स्वक्षेत्रे भ्रमयेद्वलिम् ॥ १८ ॥ पाया भरने के पत्थर रखनेकी जगहपर पारा, घिसाहुआ चन्दन, तथा कुंकुंम रखकर उनके ऊपर यथाक्रम से पांच पत्थर रक्खे उनमेंसे एक पत्थर उठा कर प्रथम मध्यमें रक्खे. और चार पत्थर जुदा जुदा चारों कोनों में रक्खे बाद पंच परमेष्ठीकी पृथक् पृथक् मंत्रोंद्वारा पूजा कर कारीगरोंको आव-आदरपूर्वक इनाम देकर सारे विघ्नोंकी शान्तिके लिए उस क्षेत्रकी पूजा करे ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ 2. पीठवन्धं ततः कुर्यात्प्रासादस्यानुसारतः । आदौ गर्भगृहं द्वारे ततः मूत्रनिवासकम् ॥ १९ ॥ ततो मण्डपविन्यासं वेदिकास्थानमुत्तमम् । द्वाराहितुः पार्श्वे चित्रशालां मनोहराम् ॥ २० ॥ . व्याख्यानकारणस्थानं नाट्यशालां विचित्रिताम् । वाद्यनिर्घोषकास्थानं मानस्तम्भं मनोहरम् ॥ २१ ॥ इत्यादिलक्षणोपेतं जिनगेहं समाप्य च । जिनबिम्बार्थमानेतुं गच्छेच्छिल्पिसमन्वितः ॥ २२ ॥ सुमुहूर्ते सुनक्षत्रे वाद्यवैभवसंयुतः । प्रसिद्ध पुण्यदेशेषु नदीनगवनेषु च ॥ २३ ॥ . afari कठिनां चैव सुखदां सुस्वरां शिलाम् । समानीय जिनेन्द्रस्य बिम्बं कार्य सुशिल्पिभिः ॥ २४ ॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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