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· त्रैवर्णिकाचार। ...
१३९ " ओं ह्रीं श्री वर्णे " इत्यादि पढ़कर सिंहासनपर लिखे हुए श्रीकारपर. प्रतिमा स्थापन करे ॥ ४८॥
ॐ हाँ अहं श्रीपरब्रह्मणे अयं निर्वपामि स्वाहा ॥ अर्घ्यदानमन्त्रः ॥ १९॥ "ओं ह्रीं अर्ह" इत्यादि मंत्र पढ कर प्रतिमाको अर्घ्य देवे ॥४९॥ ॐ नमः परब्रह्मणे श्रीपादप्रक्षालनं करोमि स्वाहा ॥ श्रीपादौ प्रक्षाल्य
तज्जलरात्मानं प्रसिञ्चेत् ॥ पाद्यम् ॥ ५० ॥ “ओं नमः परब्रह्मणे" इत्यादि पढ कर श्री जिन चरणोंका प्रक्षालन कर उस जलसे अपने को सीचे-जलकी कुछ बूदें अपने पर गेरे । इसे पाद्य कहते हैं ॥ ५०॥
ॐ हाँ ही हूँ हाँ हः अ सि आ उ सा एहि एहि संवौषट् ॥ आव्हानम् ॥ एवं अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ॥ पुनः मम
सन्निहितो भव भव वपद् सन्निधीकरणम् ॥५१॥ “ओं ह्रीं ह्रीं हूँ ह्रौं ह्रः असि आ उ सा एहि एहि संवौषट्। यह पढ कर श्री जिन भगवानका आव्हान करे । इसी तरह ओं ह्रां ह्रीं हूँ ह्रौं ह्राः असि आ उ सा अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं यह पढ कर प्रतिगजेन देवकी स्थापना करे । फिर “ओं ह्रीं ह्रीं ह्र ह्रौं ह्रः असि आ उ सा मम सन्निहितो भव भव वपट " यह पढकर सन्निधिकरण करे ॥ ५१ ॥
ॐ ही अ सि आ उ सा नमः ॥ पंचगुरुमुद्राधारणम् ॥ ५२ ॥ “ओं ही असि " यह मंत्र पढकर पंच गुरुमुद्रा धारण करे ॥ ५२ ॥ ॐ वृषभाय दिव्यदेहाय सद्योजाताय महाप्राज्ञाय अनन्तचतुष्टयाय परमसुखप्रतिष्ठिताय निर्मलाय स्वयम्भुचे अजरामरपरमपदप्राप्ताय चतुर्मुखपरमेष्ठिने महते त्रैलोक्यनाथाय त्रैलोक्यप्रस्थापनाय अधीष्ट- . . दिव्यनागपूजिताय परमपदाय ममात्र सनिहिताय स्वाहा । अनेन
पंचगुरुमुद्रानिर्वर्तनम् ॥ ततोऽपि पाद्यम् ॥ ५३ ॥ “ओं वृषभाय " इत्यादि मंत्रके द्वारा पंच गुरुमुद्राकी रचना करे । इसके बादभी पूर्वोक्त प्रमाण पाय विधान करे ॥ ५३॥ . . ॐ हाँ स्वाँ वाँ वं मं हं सं तं पं. द्राँ 'द्राँ हाँ द्राँ हं सः स्वाहा ॥
जिनस्यार्चमनम् ॥ ५४॥..