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________________ सोमसेनभट्टारकविरचित ... “ओं ह्रीं झ्वी !” इत्यादि पढकर प्रतिमाको आचमान करावे ॥ ५४॥ . - ॐ हाँ क्रौं समस्तनीराजनद्रव्यैनीराजनं करोमि अस्माकं दुरितमपनयतु - भवतु भगवते स्वाहा ।। नीराजनार्चनम् ।। ५५ ।। “ओं ह्रीं क्रौं ” इत्यादि पढ़कर जिनेंद्र देवकी आरती उतारे ॥५५॥ ॐहाँ काँ प्रशस्तवर्णसर्वलक्षणसम्पूर्णायु 'धवाहनयुवतिजनसंहिता इन्द्राग्नियमनितिवरुणपवनकुवेरेशानशेपशीतांशवो दश दिग्देवता __ आगच्छत ॥ इत्यादि दिक्पालार्चनम् ॥ ५६ ॥ "ओं ह्रीं क्रौं ।” इत्यादि पढकर दिक्पालोंका अर्चन करे ॥५६ ॥ ॐहाँ स्वस्तये कलशोद्धारणं करोमि स्वाहा ।। कलशोद्धारणम् ।।५७॥ “ओं ह्रीं स्वस्तये -- इत्यादि पढ़कर जिनाभिषेकके लिए-कलशोंको हाथमें लेवें ॥ ५७ ॥ ॐ हाँ श्रीँ क्लाँ ऐं अर्ह वं मं हं संत पंचं मं हं सं हं हं सं सं तं तं पंप झं झं श्वाँ ईयाँ या श्वाँ 'द्राँ हाँ द्रां द्रां द्रावय द्रावय नमोऽहते भगवते . श्रीमते पवित्रतरजलेन जिनमभिपेचयामि स्वाहा ।। जलस्नपनम् ।। ५८ ॥ “ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ॥ इत्यादि मंत्र पढ़कर कलश जलसे जिन देवका अभिषेक करे ॥ ५८॥ ॐ हाँ श्रीँ-इत्यादिश्रीमते सर्वरसेषु पवित्रतरनालिकेररसाम्ररसकदलोपनसेक्षुरसघृतदुग्धदधिभिः जिनमभिपेचयामि स्वाहा ॥ ५९॥ “ओं ह्रीं श्रीं ” इत्यादि पढ़कर पंचामृताभिषेक करे ॥ ५९ ॥ ॐ नमोऽहते भगवते ककोलैलालवङ्गादिचूर्जिनाङ्गमुद्वर्तयामि स्वाहा ॥६०॥ "ओं नमोऽर्हते” इत्यादि-पढ़कर कंकोला इलायची लवंग आदिसे प्रतिमाका उद्वर्तन करो।६०॥ ॐ हाँ श्रीँ क्लीं इत्यादि श्रीमते पवित्रतरचतुष्कोणकुम्भपरिपूर्णजलेन जिनमभिषेचयामि स्वाहा ।। कोणकुम्भजलस्नपनम् ॥.६१ ॥ .... "ओं ह्रीं” यह पढ़कर सिंहासनके कौनोंपर रक्खे हुए जलंके कलशोंसे भगवानको आभिषेक करेः॥ ६ . .
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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