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________________ नीके सं० शुक- प्रा० सुग, सुअ १८६. नीके-नीला । सं० नीलक-नीक । जिस प्रकार 'मलिन' शब्द से 'महल' होता है इसी प्रकार 'नीलक' से 'नीक' की उत्पत्ति शक्य है ऐसी कल्पना है । और उसी प्रकार 'नील' से 'लीला' ( गुज०) शब्द भी आया है । [१९९] स्वार्थिक 'ड' आने से सुअड सूडा | गुजराती में सूडो । भजन ६७ वां १८७. आश्रव - पाप और पुण्य आने का मार्ग | ( जैन परिभाषिक) बौद्ध पिटको में भी ऐसा शब्द इसी अर्थ में आता है । भजन ६८ वां १८८. विलई - विलय होना - नाश होना सं०- 'विलीयते ' प्रा० - 'विलीयए' । 'विल्ई' की प्रकृति 'विलीयए' है । १८९. ऊधर्यु–उद्धार करना - चहार नीकालना उद्धरि-ऊपर्यु | सं० उद्धृतम् - प्रा० उमरियं ।
SR No.010847
Book TitleBhajansangraha Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherGoleccha Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages259
LanguageHindi Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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