SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 99
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्रीमद् राजचन्द्र निगोदमे अक्षरका अनतवाँ भाग ज्ञान है, यह सर्वज्ञने देखा है। त्रस पर्यायमें जितने दुःखके प्रकार है वे सब दुख जीव अनतवार भोगता है। दु.खकी ऐसी कोई जाति बाकी नही रही, कि जिसे इस जीवने ससारमे नही पाया । इस ससारमे यह जीव दु खमय अनत पर्याय पाता है, तब कही एक बार इंद्रियजनित सुखका पर्याय प्राप्त करता है, और वह भी विषयोके आताप सहित, भय शंकासे सयुक्त अल्पकालके लिये प्राप्त करता है । पश्चात् अनत पर्याय दु खके, फिर इद्रियजनित सुखका कोई एक पर्याय कदाचित् प्राप्त होता है। अब चतुर्गतिके कुछ स्वरूपका परमागमके अनुसार चिंतन करते है। नरककी सात पृथ्वियाँ हैं, उनमे उनचास भूमिकाएं हैं। उन भूमिकाओमे चौरासी लाख बिल है, जिन्हे नरक कहते है। उनकी वज्रमय भूमि दीवारकी भाँति छजी हुई है। कितने ही बिल सख्यात योजन लंबे-चौडे है और कितने ही विल असख्यात योजन लबे-चौडे है। उस एक एक विलकी छतमे नारकीके उत्पत्तिस्थान है। वे ऊँटके मुखके आकार आदि वाले, तग मुखवाले और उलटे मुंह होते है। उनमे नारकी जीव उत्पन्न होकर नीचे सिर और ऊपर पैर किये हुए आकर वज्राग्निमय पृथ्वीमे पडकर नारकी जोरसे गिरी हुई गेदकी तरह इधरउधर उछलते और लोटते है । कैसी है नरकभूमि ? असख्यात बिच्छ्रके एक साथ काटनेसे जो वेदना होती है, उससे भी असख्यातगुनी अधिक वेदना देनेवाली है। ऊपरकी चार पश्वियोके चालीस लाख बिल और पाँचवी पृथ्वीके दो लाख बिल, यो बयालीस लाख विलोमे तो केवल आताप, अग्निको उष्ण वेदना है। उस नरककी उष्णता बतानेके लिये यहाँ कोई पदार्थ देखने-जाननेमे नही आता कि जिसकी उपमा दी जा सके। तो भी भगवानके आगममे उष्णताका ऐसा अनुमान कराया गया है कि यदि लाख योजनप्रमाण मोटा लोहेका गोला छोडे तो वह नरकभूमिमे न पहुंचकर, पहुँचनेसे पहले ही नरक क्षेत्रको उष्णतासे रसरूप होकर बह जाता है। (अपूर्ण) मुनिसमागम राजा-हे मुनिराज | आज मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ है। एक बार मेरा अभी और आगे घटित सुनने योग्य चरित्र सुननेके बाद आप मुझे अपने पवित्र जैन धर्मका सत्त्वगुणी उपदेश दें। इतना बोलनेके बाद वह चुप हो गया । मुनि-हे राजन् । तेरा चरित्र धर्म सबंधी हो तो भले आनदके साथ कह सुना । राजा-(स्वगत ) अहो । इन महान मुनिराजने 'मै राजा हूँ', 'ऐसा कहाँसे जाना । भले, यह वात फिर । अभी तो अवसरके ही गीत गाऊँ । (प्रकट ) हे भगवन् । मैने एकके बाद एक इस तरह अनेक धर्म देखे । परतु उम प्रत्येक धर्ममेसे कुछ कारणोसे मेरी आस्था उठ गयी। मैं जब प्रत्येक धर्मका ग्रहण करता तब उसके गुण विचार कर, परतु बादमे न मालूम क्या हो जाता कि जमी हुई आसक्ति एकदम नष्ट' हो जाती । यद्यपि ऐसा होनेके कुछ कारण भी थे। केवल मेरी मनोवृत्ति ही ऐसी थी, यह बात नही थी । किसी धर्ममे धर्मगुरुओकी धूर्तता देख कर, उस धर्मको छोड़कर मैने दूसरा स्वीकार किया, फिर उसमे कोई व्यभिचार जैसी दुगंध देखकर उसे छोडकर तीसरा ग्रहण किया । फिर उसमे हिंसायुक्त सिद्धात देखनेसे, उसे छोडकर चौथा ग्रहण किया। फिर किसी कारणसे उसे छोड़ देनेका फरज आ पडनेसे उसे छोडकर पाँचवाँ धर्म स्वीकार किया। इस तरह जैन धर्मके सिवाय अनेक धर्म अपनाये और छोड़े। जैन धर्मका केवल वेराग्य ही देखकर मूलत. उस धर्म पर मुझे भाव हुआ ही नही था। बहुतसे धर्मोंकी उधेड़बुनमे आखिर मैंने ऐसा सिद्धात निश्चित किया कि सभी धर्म मिथ्या हे | धर्माचार्योंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार
SR No.010840
Book TitleShrimad Rajchandra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Jain
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1991
Total Pages1068
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Rajchandra
File Size49 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy