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________________ सत्यामृत 1-असाधारणता- नोपोमो] आवश्य- है. ३-दानी संग्रह शील नी होसकता है कता अनावश्यकता उचित अनुचिन का विचार अतिसंग्रह भी कर सकता है, त्यागी निरतिग्रही न कति हुए, बहुतों का ध्यान बचने लायक होता है। इस कारणों से नानीसे त्यागी श्रेष्ठ है। प्रद्मुतता या विशेषता को यहा असाधारणता नानी और त्यागी बतनसे महत्व भी मिलता कहा गया है। विद्या बुद्धि सौन्दर्य आदि की है और उसका भानन्द उठाने में कोई बुराई असाधारणता का महत्व उनकी उपयोगिता के नहीं है। हो । प्रदर्शन सा न होजाय नि महत्व पीछे है। पर इसमें कोई उपयोगिता का विचार के लिये ही गान या त्याग किया है । महत्व नहीं है सिर्फ कुतूहल के कारण उसके देवनेवाला के लक्ष्यमे दान और त्याग न करना चाहिये। रा जमघट लगता है और इससे वह एक तरह नहीं तो वह निप्पल होजायगा । की महत्ता पाजाता है। जैसे किसी नं खूब लम्बे १४ सेवा ( मियो ) परोपकार के लिये नाद बढ़ालिये तो इसमें कोई उपयोगिता का अपनी शक्ति योग्यता समय आदि का उपयोग विचार नहीं है फिर भी दर्शनार्थी आजायेंगे काता सेवा है। इससे भी महत्व सिलना है। और महत्व बजायगा। कोई सत्र से 3'चा है इस आनन्द लेना चाहिये । हा ! अहंकार न काइ सब न नीचा है, किसी मनुष्य के छ भने पाये ईयां न आने पाय दुसरे सेवकों का निकल आई है, किसी बेल के नीन माग भागय अपमान न होने पाये । नहीं तो वर मुःसुन्न है यनर श्रमायाराना एक तरह का महत्व होजायगा। पंग का देती है पर ये मब व्या है । इसप्रकार सरकार महत्त्वानन्नों को करना के मात्य का यानन्द लेना मूर्खता है। सी चाहिये और वे द.मुन्न न बानाग इसका ध्यान प्रभाधाराना नो को पैदा करने की कोशिश न रखना चाहिये। गाना चाहियदि त्ययं पटा होगई हो ना उनम महत्वानन्द का अनुभव न करना चाहिये । __ 'पाठयां आनन्द गैदानन्द है । वह उब . दुसुन्ध रूप होता है तब पापानन्ट कहलाता है। १२-गान ( दानो ) परोपकार के लिये यह बहन धुरा आनन्द है । इसलिये पापानन्द -पनी सम्पत्ति मागणे काना दान । मे बचते रहना चाहिये । यह एक नगह मे गैना१३-राग (मिंचो)-स्वपरकल्याण के नियत की निशानी है। निय प्राप्त या ग्राम सम्पत्ति. मुवि वाया था इस प्रमा आठ या बत्तर तरह के अन्य मुनकर वन्तु नी का छोडना त्याग है! नान को अपना त्याग व्यापक और श्रेष्ठ प्रभ-इन बाट प्रकार के सुखाम न दो सान भी नह का त्याग है फिर भी काम सम्प का उल्लेव है न मोज मुख का । अगर मोनी में कार्य अलर ई-१-गान में अपनी प्राठा सव काममुख है नो मोजसुख का "प्रायम्य सुविधाएँ बहुन अंगो मे मुरजिन अनग उल्लेख क्या नहीं किया गया ? मनी और त्याग में आवश्यक सुविधाएं उत्तर--काम और मोजसम्म के अलग "धिक पगी में नोड़ना पड़ती है। दानी इलरको जारन नहीं है क्योकि धार कार गगनगा यष्टि अपना प्रमाणन करता सम्म कामसर भी होमरत है और मोन होना है और बापान के नगे की साब भी होसकते ई 1 कामसम्म पनिस्तिक माना अशुद्रनारी मी पवाह नहीं करना ५ होत है इमलिचे पगचीन है मोनसप अपनी 17 या यानानेवाले व्यक्तिले प्रयोगार्जन भावनाली से पंदा होते हैं इसलिये स्वाधीन है। मग मी दोपदेना या मनिम करना पडता राममय बाहरी परिस्थिति के अनुमार होने रमाला भी गाना पड़ना है. नोनमुन्य बाहरी परिस्थिति के प्रतिटन रानं
SR No.010834
Book TitleSatyamrut Drhsuti Kand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSatya Samaj Sansthapak
PublisherSatyashram Vardha
Publication Year1951
Total Pages259
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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