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सत्यामृत
वडा
साधु की मूर्ति कोनो नग्न तक रहा हो गइन यम का पता लगता है । कुयाचना देव-मृद्ता का पहिनाना श्रादि। ये सब रूपभ्रम देव-मूढता के परिणाम है। हो एक रूप है।
प्रश्न-व्यक्तिदेवों की उपासना में उनके प्रश्न-आलंकारिक वर्णन में थोड़ी अति- जीवन का अनुकरण लक्ष्य हो सकता है पर ईश्वर शयोक्ति हो ही जाती है। अगर उन्हे देव-मदता की उपासना में क्या ध्येय होगा। ईश्वर का अनु कहा जायगा तब तो काव्य की इतिश्री ही हो करण तो किया नहीं जा सकता। उससे छोटी जायगी।
वडी सभी चीजो की याचना ही की जा सकती उत्तर-अलंकार अलंकाररूप में काम में है। राणी तो ईश्वर के प्रागे सदा मिखारी है। श्रा तो कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि उससे उससे याचना क्या और कुयाचना क्या ? अर्थ में कोई कमी नहीं होती वल्कि अर्थ स्पष्ट
उत्तर-जगदीश्वर एक ही हो सकता है होता है । मुख को चन्द्रमा कहने स सुन्तरवा ही इसलिये हरएक आदमी जगदीश्वर नहीं बन मालूम होती है उसे प्रकाश समझकर रात में सकता फिर भी उसका अनुकरण कर सकता है। दीपक नहीं बुझाय जाते। दुःख का पहाड़ उठा डावर सर्वगुण-मण्डार है इसलिये लिस गुण का लिया, विपत्ति के समुद्र को पी गया या पार कर जिसने अणों में अनुकरण हो उतना ही अच्छा गया आदि अलंकार वाक्य के अर्थ को सुन्दर है। उसके सामने सिर झुकाने में उसक शासन और साफ बनाते हैं इसलिये अलकार के उपयोग के विषय में श्रद्धा रगट होती है और इससे में मूढ़ता नहीं है। मूढता है अलकार को इतिहास उसकी व्यवस्था नीति धर्म को बनाये रखने की या विज्ञान समझने में। पुराणों में आये हुए मुच्छा पैदा और रगट होती है। उससे अपने बहुत से वर्णन इसी प्रकार के बालकारिक है उनका वास्तविक अर्थ पहिचान लेनेपर मदता
विकास की या आत्मवल की ही याचना करना नहीं रहती।
चाहिये-दया नमा की नहीं। प्रार्थना में अगर
भक्तिवश व्या क्षमा के शन्द आ भी आयें तो ३ तीसरी देव-मूढता है कुयाचना । देवो- इतना ही समझना चाहिये कि हम अपने पापों पासना का मतलब उनके गुणों को या श्राज्ञाओं को स्वीकार कर रहे हैं और पश्चात्ताप प्रकट कर को अपने जीवन में उतारता है जिससे हमारा रहे हैं। ईश्वरीय न्याय को बदलना नहीं चाहते। उद्धार हो। भकि-सय भाषा मे हम यह भी कह वास्तव में कोई मनुष्य ईश्वर का अपराध नहीं सकते है कि तुम हमारा उद्वार करो, जगत में करता, नहीं कर सकता, वह अपराध करता है शान्ति करो, हमारे पापा को दूर करो आदि। उसकी सन्तान का अर्थात हमारा तुम्हारा, उसका इसका मतलब यही कि हम आपका अनुसरण न्याय होना ही चाहिये । इसलिये न्याय से बचने फरें जिससे हमारा उद्वार हो आदि। यह कया- की याचना कुयाचना है। हाँ पाप काने से दूर चना नहीं है । पर सहा अपने कर्तव्य की भावना रहने की और संकट सहने की याचना सुयाचना नाह नहीं, मिर्फ देव को खश कर वन की है वह सागना चाहेय। ईश्वर के आगे इतना ही स्वास्थ्य की, सन्तान की विजय को. शत्र-जय मिखारीपन सार्थक है। की याचना है वह कुयाचना है। देव-पूजा अपने प्रश्न-धन सम्पत्ति आदि की याचना भी कर्तव्य का सम्मान और उसका पालन करने देवोपासना से सफल होती है। देवोपासना से
और उसपर रह रहने के लिये होना चाहिये पुण्य होता है और पुण्य से ऐहिक लाभ मिजत मुफ्तखोरी के लिये नहीं। कुयाचना करने से वह हैं फिर मनुष्य वह याचना क्यों न करे ? अथवा पूरी नहाती मिर्फ अपनी क्षुद्रता और अम- रमे कुयाचना क्यों कहा जाब ?