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________________ निर्जराधिकार ( २०६/१ ) अतः भव्य ! तू ज्ञान भाव में रत हो, तज मिथ्यात्व निदान । रागद्वेष परणति से बचकर रुचि से ज्ञानामृत कर पान । प्रास्वादन कर इस का ही जो हो जाये संतुष्ट प्रयोण । वही अतीन्द्रिय सुख सागर में केलि करै शाश्वत स्वाधीन । ( २०६/२ ) अतुल ज्ञान चितामणि राजित, वर प्रचित्य सामर्थ्य निधान । तू सर्वार्थ - सिद्धि संभूषित स्वयं देव-चिद्रूप महान । स्व-पद विरच, जो अजर अमर है, निर्विकार शाश्वत सुखलान अन्य परिग्रह को चिंता कर क्यों व्याकुल है बन अनजान ? ( २०७ ) प्रात्मभिन्न जड़-चेतन जितने विद्यमान है भाव अनंत । ज्ञानी कौन कहेगा उनको ये सब मेरे ही है, संत ! यतः स्व जो है वही रहेगा अतः स्व को तू कर पहिचान ! स्व में स्व को संप्राप्त व्यक्ति हो पाता-पद परमात्म महान । (२०६/१) केनि-कोटा । शाश्वत-स्थायी ।
SR No.010791
Book TitleSamaysar Vaibhav
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Dongariya Jain
PublisherJain Dharm Prakashan Karyalaya
Publication Year1970
Total Pages203
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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