SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 293
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जैन-दर्शन एक चिन्तन जा सकता, उसे परमाणु कहते है। पुद्गल-परमाणु अनन्त और निरवयव है । दो या दो से अधिक परमाणुओ का परस्पर सम्बन्ध होने से स्कन्ध बनता है। रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्द आदि को पुद्गल गुण कहा गया है । जब मूल तत्त्व के रूप मे चैतन्य और जड स्वीकृत हो जाता है, तब इन दोनो तत्त्वो का आपस मे कोई सम्बन्ध है, या दोनो परस्पर निरपेक्ष होकर अपना कार्य करते है ? यह प्रश्न उपस्थित होता है । जैन-दर्शन पारस्परिक सम्बन्ध स्वीकार करता है । जीव और पुद्गल के साथ धर्म, अधर्म, काल और आकाश के सम्बन्ध को साधारण सम्बन्ध कहा जा सकता है । क्योकि जीव या पुद्गल को यदि क्रिया करना हो तो धर्म, स्थिर रहना हो तो अधर्म, स्थान पाना हो तो आकाश, अवस्थान्तर प्राप्त करना हो तो काल, उन्हे सहायता मात्र देता है । वे चारो जीव और पुद्गल पर अपना प्रभाव विस्तार नही करते है, न सृष्टि विचित्रता मे उनकी कोई शक्ति हो है । पर आत्मा के साथ पुद्गल का सम्बन्ध, घनिष्ठ सम्बन्ध है । अचेतन होने पर भी पुद्गल अपनी शक्ति से आत्मा को प्रभावित करता है । आत्मा भी पुद्गल पर अपना प्रभाव विस्तार करता है । यो तो पुद्गल द्रव्य बहुत प्रकार के है, पर जो पुद्गल परमाणु आत्मा पर अपना प्रभाव विस्तार करता है, उसे कर्म कहा जाता है । जीव और पुद्गल का सम्बन्ध अनादि सिद्ध है । जीव और पुद्गल का सम्बन्ध अनादि क्यो है ? यह प्रश्न युक्तिसगत नही है। क्योकि उन दोनो का स्वभाव ही वैसा है । युक्ति या तर्क से हम वस्तु के स्वभाव को बदल नहीं सकते तथा अस्वीकार भी नहीं कर सकते । कहा भी गया है-"यदीयं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् ।" पुद्गल के साथ आत्मा का सम्बन्ध अनादि होने के कारण कर्म पुद्गल आत्मा के विशुद्ध ज्ञानादि गुण को प्राय. आवृत कर देता है और जीव अज्ञानता और मोहवश पुद्गल को अपना कहकर अपना लेता है। फलस्वरूप वह राग-द्वेष के वशीभूत होकर कही चैन नही पाता है और उसे अपना समझ कर विविध रूप मे रूपान्तरित करता है । इस चैतन्य तथा पुद्गल का जो परस्पर प्रभाव है तथा इसके कारण जो सुख-दुख, व्याकुलता आदि उत्पन्न होती है, उससे आत्मा को ही क्षति पहुंचती है न कि पुद्गल को । आत्मा मे अनुभव-शक्ति है, इसलिए दुःखादि का अनुभव करता है और अपने ज्ञानमय, आनन्दमय स्वरूप से प्रच्युत रहता है । दूसरी तरफ पुद्गल का विचित्र रूप में परिणत होना स्वभाव ही है । अतएव आत्मा पुद्गल के विचित्र परिणामो मे सहायक ही बनता है । पुद्गल के बन्धन मे आबद्ध आत्मा उस बन्धन को तोड सकता है या नहीं, इस पर जनदर्शन ने काफी विचार किया है। पाप, पुण्य, आत्रव, सवर, बन्ध, कर्म, कर्म का स्वरूप इत्यादि विपयक विचार भी इस विचार से फलित होता है । जैन-दर्शन आत्मा मे एक ऐसी शक्ति स्वीकार करता है कि जिसके बल से आत्मा अनादि पोद्गलिक सम्बन्ध को छिन्न-भिन्न करके अपने स्वरूप को पा जाता है । जीव सुख पाने के लिए सब समय प्रयत्न करता है और पौद्गलिक साधनो का सग्रह करता है । जब उससे सुख नही मिलता तो और अधिकाधिक पौद्गलिक साधनो का सग्रह करता है। फिर भी जब वह उससे सुख-शान्ति नही पाता, तो सब जीव नही, पर विकसित होने वाला जीवात्मा अशान्ति के कारणो की खोज मे लग जाता है। धीरे-धीरे उसका चित्त बाह्य विषयो से हटकर अन्तर्मुखी होता रहता है और जैसे-जैसे उसे आत्मउपलब्धि होती जाती है, वैसे-वैसे उसे पौद्गलिक स्वरूप भासित होता है और उससे उसका सम्बन्ध छूटता १६७
SR No.010772
Book TitleRatnamuni Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaymuni Shastri, Harishankar Sharma
PublisherGurudev Smruti Granth Samiti
Publication Year1964
Total Pages687
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy