SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 303
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ग्रन्थ- परिचय | २१५ निकलती हैं कि वह समन्तभद्रका एक स्वतंत्र और प्रधान ग्रंथ है । देवागम ( आप्तमीमांसा ) की अन्तिम कारिका भी इसी भावको पुष्ट करती हुई नजर आती है और वह निम्न प्रकार हैतीयमासमीमांसा विहिता हितमिच्छतां । सम्यग्मिथ्योपदेशार्थविशेषप्रतिपत्तये ॥ वसुनन्दि आचार्यने, अपनी टीकामें इस कारिकाको 'शास्त्रार्थोपसंहार- कारिका' लिखा है, और इसकी टीकाके अन्तमें समंतभद्रका कृतकृत्यः निर्व्यूढतत्त्वप्रतिज्ञः' इत्यादि विशेषणोंके साथ उल्लेख किया है। विद्यानंदाचार्यने, अष्टसहस्रीमें, इस कारिका के द्वारा प्रारब्धनिर्वहण — प्रारंभ किये हुए कार्य की परिसमाप्ति - आदिको सूचित करते हुए, देवागम ' को ' स्वोतपरिच्छेद शास्त्र' बतलाया है— अर्थात्, यह प्रतिपादन किया है कि इस शास्त्रमें जो दश परिच्छेदोंका विभाग पाया जाता है वह स्वयं स्वामी समन्तभद्रका किया हुआ है । अकलंकदेवने भी, ऐसा ही प्रतिपादन किया है । और इस सब कथनसे " १ जो लोग अपना हित चाहते ह उन्हें लक्ष्य करके, यह 'आप्तमीमांसा' सम्यक् और मिथ्या उपदेश के अर्थविशेषकी प्रतिपत्ति के लिये कही गई है । २ शास्त्र के विषयका उपसंहार करनेवाली अथवा उसकी समाप्तिकी सूचक कारिका । ३ ये दोनों विशेषण समन्तभद्रके द्वारा प्रारंभ किये हुए ग्रंथकी परिसमाको सूचित करते हैं । ४ " इति देवागमाख्ये स्वोक्तपरिच्छेदे शास्त्रे ( स्वेनोक्ताः परिच्छेदा दश यस्मिंस्तत् स्वोक्तपरिच्छेदमिति ग्राह्यं तत्र ) विहितेयमाप्तमीमांसा सर्वज्ञविशेष - परीक्षा......" अष्टसहस्त्री । ५ " इति स्वोक्तपरिच्छेदविहितेयमाप्तमीमांसा सर्वज्ञविशेषपरीक्षा ।" -अष्टशती । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy