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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ६१७-८] छठवाँ अध्याय अज्ञानसे किसी प्राणीको मारने आदिमें प्रवृत्त होना अज्ञातभाव है । आधारको अधिकरण कहते हैं। और द्रव्यको स्वशक्ति विशेषको वीर्य कहते हैं। क्रोध, राग, द्वेष, सजन और दुर्जन जनका संयोग और देशकाल आदि बाह्य कारणोंके क्शसे किसी आत्मामें इन्द्रिय, कषाय, अव्रत और क्रियाओंकी प्रवृत्तिमें तीव्र भाव और किसीमें मन्द भाव होते हैं । और परिणामके अनुसार ही तीव्र या मन्द आस्रव होता है। जानकर इन्द्रिय, अव्रत आदिमें प्रवृत्ति करनेपर अल्प आस्रव होता है । अधिकरणकी विशेषतासे भी आस्रवमें विशेषता होती है जैसे वेश्याके साथ आलिङ्गन करनेपर अल्प और राजपत्नी या भिक्षुणीसे आलिङ्गन करनेपर महान् श्रास्त्राव होता है । वीर्यकी विशेषता से भी आस्रवमें विशेषता होती है जैसे वज्रवृषभनाराचसंहननवाले पुरुषको पाप कर्ममें प्रवृत्त होनेपर महान् श्रास्रव होगा और हीन संहननवाले पुरुषके अल्प आस्रव होगा। इसी प्रकार देश काल आदिके भेदसे भी आस्रवमें भेद होता है जैसे घरमें ब्रह्मचर्य भंग करनेपर अल्प और देवालयमें ब्रह्मचर्य भंग करनेपर अधिक आस्रव होगा। उससे भी अधिक आस्रव तीर्थयात्राको जाते समय मार्ग में ब्रह्मचर्य भंग करनेपर, उससेभी अधिक तीर्थस्थान पर ब्रह्मचर्य भङ्ग करनेपर तीन श्रास्रव होता है। इसी तरह देववन्दना आदि के कालमें कुप्रवृत्ति करनेपर महान् आस्रव होता है। इसी प्रकार पुस्तकादि द्रव्यकी अपेक्षा भी आस्रवमें विशेपता होती है । इस प्रकार उक्त कारणों के भेदसे आस्रव में भेद समझना चाहिये । अधिकरणका स्वरूप अधिकरणं जीवाजीवाः ॥ ७॥ जीव और अजीव ये दो आस्रवके अधिकरण या आधार हैं । यद्यपि सम्पूर्ण शुभ और अशुभ आस्रव जीवके ही होता है लेकिन आस्रवका निमित्त जीव और अजीव दोनों होते हैं अतः दोनोंको आस्रवका अधिकरण कहा गया है। जीव और अजीव दो द्रव्य होने से सूत्रमें "जीवाजीवौ" इस प्रकार द्विवचन होना चाहिये था लेकिन जीव और अजीवकी पर्यायोंको भी आसवका अधिकरण होनेसे पर्यायोंकी अपेक्षा सूत्रमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है। जीवाधिकरणके भेदआद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकपायविशेषैस्विस्त्रिचतुश्चैकशः ॥ ८॥ संरंभ, समारंभ और आरम्भ, मन, वचन और काय; कृत, कारित और अनुमोदना, क्रोध, मान, माया और लोभ इनके परस्परमें गुणा करनेपर जीवाधिकरणके एक सौ आठ भेद होते हैं। किसी कार्यको करनेका संकल्प करना संरंभ है। कार्यकी सामग्रीका एकत्रित करनेका नाम समारंभ है । और कार्यको प्रारंभ कर देना आरंभ है। स्वयं करना कृत, दूसरेसे कराना कारित और किसी कार्यको करनेवालेकी प्रशंसा करना अनुमत या अनुमोदना है । जीवाधिकरणके एक सौ आठ भेद इस प्रकार होते हैं। क्रोधकृतकायसंरंभ, मानकृतकायसंरंभ, मायाकृतकायसंरंभ, लोभकृतकायसंरंभ, क्रोधकारितकायरिंभ, मानकारितकायसंरंभ, मायाकारितकायसंरंभ, लोभकारितकायसंरंभ, क्रोधानुमतकायसंरंभ, मानानुमतकायसंरंभ, मायानुमतकायसंरंभ और लोभानुमतकायसंरंभ इस प्रकार कायसरंभके बारह भेद हैं। वचन संरंभ और मनः संरंभके भी इसी प्रकार बारह बारह भेद समझना चाहिये । इस प्रकार संरंभके कुल छत्तीस भेद हुये । इसी प्रकार For Private And Personal Use Only
SR No.010564
Book TitleTattvartha Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1949
Total Pages661
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size10 MB
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