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________________ समवायाङ्ग सूत्र ॥ चो अंग ॥२५६॥ पण नहीं. ( परंतु सदाकाळ ) हतुं, छे अने हशे वळी ते अचळ, ध्रुव यावत् अवस्थित अने नित्य छे । आ द्वादशांग गणिपिटक विषे अनंत भावो, अनंत अभावो, अनंत हेतुओ, अनंत अहेतुओ, अनंत कारणो, अनंत अकारणो, अनंत जीवो अनंत अजीवो, अनंत भवसिद्धिओ, अनंत अभवसिद्धिओ, अनंत सिद्धो अने अनंत असिद्धो कहेवाय छे, प्रज्ञापन कराय छे, प्ररूपणा कराय छे, देखाडाय छे, निदर्शन कराय छे अने उपदर्शन कराय छे. ते आ प्रमाणे द्वादशांग गणिपिटक कां ॥सूत्र - १४८ ॥ टीकार्थ:-' इच्चेइयं ' इत्यादि -आ द्वादशांग गणिपिटकने अतीत (भूत) काळने विषे अनंत जीवो आज्ञावडे विराधीने चातुरंत संसारकांतारमां पर्यटन करता हता, कारण के आ द्वादशांग सूत्र, अर्थ अने उभय ( सूत्र अने अर्थ बन्ने ) भेदवडे त्रण प्रकारनुं छे. तेथी करीने आज्ञावडे एटले कदाग्रहने लीघे पाठादिकने अन्यथा करवारूप सूत्राज्ञावडे ( विराधीने) अतीत काळने विषे अनंत जीवो चतुरंत संसारकांतारमां एटले नारकी, तिर्यच, नर अने देवरूप विविध वृक्षोना समूहने लीधे दुस्तर एवा आ गाढ भवारण्यमां जमालिनी जेम पर्यटन करता हता, अने कदाग्रहने लीधे अन्यथा प्ररूपणा(विपरीत अर्थ कहेवा ) रूप अर्थाज्ञावडे ( विराधीने ) गोष्ठा माहिलादिकनी जेम तथा पांच प्रकारना आचारनुं ज्ञान अने तेज प्रमाणे क्रिया करवामां उद्यमवाळा गुरु जे आदेश आपे तेनाथी विपरीत करवारूप उभयाज्ञावडे गुरुना प्रत्यनीकपणे वर्तता द्रव्यलिंगने धारण करनारा अनेक साधुओनी जेम सूत्र, अर्थ अने उभयनी विराधना करीने अथवा तो द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भावनी अपेक्षावाळं आगममां कहेलं जे अनुष्ठान ते रूपी आज्ञाने विराधीने नहीं करीने पर्यटन करता हता, एवो भावार्थ जाणवो । ' इचेइयं ' इत्यादि सूत्र सुगम छे. विशेष ए के परिता जीवो एटले संख्याता जीवो दृष्टिवाद परिचय | ॥२५६॥
SR No.010536
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayang Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJethalal Haribhai
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1939
Total Pages681
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_samvayang
File Size44 MB
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