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________________ (( १३६ ) भीजैन नाटकीय रामायण । कुपथायें बन्द न होंगी भारत की उन्नति होना असम्भव है। माता पिता जिसके निर्दोष होते हैं सन्तान भी हनुमान के समान निर्दोष पैदा होती है। पर्दा गिरता है। अंक तृतिय-दृश्य तृतिय (अन्जना और पवनकुमार बैठे हुवे हैं) अंजना—मैं आपके दर्शन पाकर अपने सारे दुख भूल गई। पवन-मैं क्षमा चाहता हूं कि तुम्हें मेरे ही कारण इतने कष्ट उठाने पड़े । दुष्ट माता ने तुम्हें घर से निकाला । आह जब मैं तुम्हारे दुखों क ऊपर ध्यान करता हूं तो मेरा दिल दहलता है वह शेर कितना भयानक होगा ? | ___अंजना-मेरे तो यह सब दुष्कर्मों का उदय था जो मैंने अभी तक भोगे ! किन्तु आपसे मिलने की आशा में मैं अपने प्राण रखे रही । आपने मेरे लिये कितने कष्ट सहै । बन २ में मुझे ढूंढते फिरे । मेरे विग्ह में सब कुछ त्याग दिया आपका मेरे अपर भतुल्य प्रेम है। . पवन-तुम्हारे मामाजी यदि न पहुंचते तो सचमुच मेरी जान चली जाती उनकी मेरे ऊपर कितनी असीम कृपा है ! मुझे । बह यहां लाये तुमसे मिलाप कराया।
SR No.010505
Book TitleJain Natakiya Ramayan
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages312
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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