SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 89
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पाम नौमक रखना, जुदी जुदी विस्तार । नीम निमालो तेल खल, नौमतणो परिवार ॥ ४॥ इमि हिन आठों दाननी, अधर्म तणो परिवार । धर्म दोनमें मिले नहौं, श्रीजिन पाजा बाहर ॥५॥ इतरामें समझो नहीं, तो कहूं भिन्न भिन्न भेद । विवरा सहित बताइयां, मत का करज्यो खेद ॥६॥ ® ढाल कृपण दोन पनाथ ए, मलेच्छादिक त्यांरी जाति ए। रोग शोक ने भातं ध्यान ए, त्यांने देवै पनुकम्पा दान ए ॥ १॥ त्यांने देवे मूलादिक जमौ कन्द ए, त्यांमें अनन्त जीवांरा बन्द ए। तिण दिया कहै मिश्र धर्म ए, तिण उदय माया मोह कर्म ए ॥२॥ लवण पादिक पृथ्वी काय ए, आप अग्नि ढोले पानी बाय ए। शस्त्रादिक विविध प्रकार ए, दून दानसू सले संसार ए ॥ ३ ॥ बन्धौवानादिकने कान ए, त्यांने कष्ट पड्यां देवे साज ए। थारी बावरी भौल कसाइने ए, सचितादिक द्रव्य खवाइने ए ॥ ४ ॥ छोड़ावा देवें ग्रन्थ ताम ए, संग्रह दान छै तिणरो नाम ए। यह तो संसारना उपकार ए, अरिहन्वनी पाजा बाहर ए ॥ ५ ॥ ग्रह करड़ा लग्या जाण ए, सुखी लागी पनोती प्राण ए। फिकर घणो मरबातणी ए, फिर
SR No.010500
Book TitleJain Hit Shiksha Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKumbhkaran Tikamchand Chopda Bikaner
PublisherKumbhkaran Tikamchand Chopda Bikaner
Publication Year1925
Total Pages243
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy