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( ६१ ) अर्थ-द्विजाति ब्राह्मण आदिक अग्नि होत्री अग्नि को देवता मानते हैं । मुनीश्वर हृदय स्थित आत्म ज्ञान को देव मानते हैं अल्प बुद्धि लोक अर्थात् मूर्ख प्रतिमा (मूर्ति) को देव मानते हैं, समदर्शी सर्वत्र देव मानते हैं ॥१९॥ और हमने भी बड़े बड़े पण्डित जों विशेष कर भक्ति अंग को मुख्य रखते हैं, उन्हों से सुना है कि यावद् काल ज्ञान नहीं. तावत् काल मूर्ति पूजन है और कई जगह लिखा भी देखनेमें आया है यथा जैनीदिगम्ब राम्नायी भाई शमीरचन्द जैनप्रकाश उरदू किताब सन् १९०४ लाहौर में छपी जिसके सफा ३८ सतर ४ से ९ तक लिखता है-जो शषस वैराग्य भावको पैदाकरना चाहताहै उस के लिये भगवान की मूर्ति निशान का काम