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________________ ( १३ ) साधूनां दर्शनं पुण्यं, तीर्थ भूताहि साधवः । कालेन फलते तीर्थ, सद्यः साधु समागमः॥ अर्थ-साध का दर्शन ही सुकृत है साधु ही तीर्थ रूप है तीर्थ तो कभी फल देगा साधुओं का संग शीघूही फलदायक है। १ । और जो धर्म सभा में धर्म सुन ने को अधिकारी आवे वह यात्री। २ । और जो धर्म प्रीति और धर्म का बधाना अर्थात् आश्रव का घटाना सम्बर का बधाना (विषयानन्द को घटानाआत्मानन्द को बधाना ) वह यात्रा ।३। इन पूर्वोक्त सर्व का सिद्धान्त ( सार ) मुक्ति है अर्थात् सर्व प्रकार शारीरी मानसी दुःख से छूट कर सदैव सर्वज्ञता आत्मा आनन्द में रमता रहे। ॥ इति दशनियमः॥ शुभम् ॥
SR No.010483
Book TitleSatyartha Chandrodaya Jain arthat Mithyatva Timir Nashak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParvati Sati
PublisherLalameharchandra Lakshmandas Shravak
Publication Year
Total Pages229
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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