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( ७५ ) आते हैं सांसारिक स्वार्थ होने से परंतु मुक्ति के साधन में मूर्ति का पूजन नहीं चला यदि जिन मार्ग में जिन मंदिर का पूजना सम्यक्त धर्म का लक्षण होता तो सुधर्म स्वामी जी अवश्य सविस्तार प्रकट सूत्रों में सर्व कथनों को छोड़ प्रथम इसी कथन को लिखते क्योंकि हम देखते हैं कि सूत्रों में ठाम २ जिन पदार्थो से हमारा विशेष करके आत्मीय स्वार्थ भी सिद्ध नहीं होता है उनका विस्तार सैंकड़े पृष्ठों पर लिख धरा है, यथा ज्ञाताजी में मेघ कुमार के महल, मल्लिदिन्न की चित्रसाली, जिन रस्किया जिन पालिया के अध्ययन में चार वागोंका वर्णन, और जीवाभिगमजी रायप्रश्नी में पर्वत,पहाड़,वन,वाग पंचवर्ण के तृणादि का पुनःपुनः वर्णन विशेष लिखाहै प