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________________ (९४) यह सातो व्यसन संग तजोरे भाइ । जो कुसंगत से लगे दाग तुम तांइ ॥ अब क्यों भूला है भरम मायाके मांइ । तेरा जोबन जोर चला छिन्न मांइ ॥ सकुन तकीये वर उम्मर नहीं पाय दारे॥पाय॥१॥ अब साधूजी महाराज सुनावे जिनवाणी । तुम रखो पक्की परतीत झूठ मत जाणी॥ अब करो सखावत सुपात्र हिये हुल्लसानी । और करो कर्मसे जंग खडे मैदानी ॥ यों करो भक्ति भगवंत की जन्म सुधारे।पाय॥२॥ यह फिरे कालका चक्र खोफ जरा लाना ॥ निज नाम धनीका लगा देना निशाना ॥ मत पीवो मदिरा तजो मांसका खाना ॥ क्यों करते हो परद्वार पर आना जाना । 'मतकरोसोबत जाहिलोकी जन्म बिगारे॥पाय॥३॥
SR No.010456
Book TitleJain Subodh Ratnavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Maharaj
PublisherPannalal Jamnalal Ramlal Kimti Haidrabad
Publication Year1913
Total Pages221
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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