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________________ ८७१ गा० २०६] चारित्रमोहक्षपक-कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण विसेसहीणं । १३२५ एस कमो ताव जाव सुहुमसांपराइयस्स पहमद्विदिखंडयं चरिमसमयअणिल्लेविदं ति । १३२६. पढमे द्विदिखंडए णिल्लेविदे [ जं] उदये पदेसग्गं दिस्सदि तं थोवं । विदियाए हिदीए असंखेज्जगुणं । एवं ताव जाव गुणसेडिसीसयं । गुणसेडिसीसयादो अण्णा च एका हिदि त्ति असंखेज्जगुणं दिस्सदि। १३२७. तत्तो विसेसहीणं जाव उक्कस्सिया मोहणीयस्स हिदि त्ति । १३२८ सुहुमसांपराइयस्स पढमद्विदिखंडए पढमसमयणिल्लेविदे गुणसेडिं मोत्तूण केण कारणेण सेसिगासु द्विदीसु एयगोवुच्छा सेढी जादा त्ति ? एदस्स साहणमिमाणि अप्पाबहुअपदाणि । १३२९. तं जहा । १३३०. सव्वत्थोवा सुहुमसांपराइयद्धा । १३३१. पडमसमयसुहुमसांपराइयस्स मोहणीयस्स गुणसेडिणिक्खेवो विसेसाहिओ । १३३२. अंतरविदीओ संखेज्जगुणाओ। १३३३. सुहुमसांपराइयस्स परमद्विदिखंडयं मोहणीये संखेज्जगुणं । १३३४. पढमसमयसुहुमसांपराइयस्स मोहणीयस्स द्विदिसंतकम्म संखेज्जगुणं । १३३५. लोभस्स विदियकिट्टि वेदयमाणस्स जा पढमहिदी तिस्से पढमद्विदीए जाव तिण्णि आवलियाओ सेसाओ ताव लोभस्स विदियकिट्टीदो लोभस्स तदियकिट्टीए संछुभदि पदेसग्गं, तेण परंण संछुब्भदिः सव्वं सुहुमसांपराइयकिट्टीसु संछुब्भदि । १३३६. लोभस्स विदियकिट्टि वेदयमाणस्स जा पहमशान दिखाई देता है । यह क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक कि सूक्ष्मसाम्परायिकके प्रथम स्थितिकांडकके समाप्त होनेका चरम समय नहीं प्राप्त होता है। प्रथम स्थितिकांडकके निर्लेपित होनेपर जो प्रदेशाग्र उदयमें दिखाई देता है, वह अल्प है। द्वितीय स्थितिमे जो प्रदेशाग्र दिखाई देता है, वह असंख्यातगुणित है। इस प्रकार यह क्रम तव तक जारी रहता है, जब तक कि गुणश्रेणीशीर्ष प्राप्त होता है। गुणश्रेणीशीर्षसे आगे एक अन्य स्थिति प्राप्त होने तक असंख्यातगुणित प्रदेशाग्र दिखाई देता है। तत्पश्चात् मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थितितक विशेष हीन प्रदेशाग्र दिखाई देता है ।। १३१९-१३२७॥ चूर्णिसू०-सूक्ष्मसाम्परायिकके प्रथम स्थितिकांडकके उत्कीर्ण होनेके पश्चात् प्रथम समयमें गुणश्रेणीको छोड़कर शेष स्थितियोमे किस कारणसे एक गोपुच्छारूप श्रेणी हुई है, इस बातके साधनार्थ ये वक्ष्यमाण अल्पबहुत्व-पद जानने योग्य हैं। वे इस प्रकार है-सूक्ष्मसाम्परायिकका काल सबसे कम है। प्रथम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके मोहनीयका गुणश्रेणीनिक्षेप विशेष अधिक है। अन्तरस्थितियाँ संख्यातगुणी है। सूक्ष्मसाम्परायिकके मोहनीयका प्रथम स्थितिकांडक संख्यातगुणा है। प्रथमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके मोहनीयका स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ॥१३२८.१३३४॥ चूर्णिसू०-लोभकी द्वितीय कृष्टिको वेदन करनेवालेके जो प्रथम स्थिति है, उस प्रथम स्थितिकी जव तक तीन आवलियाँ शेष हैं, तब तक लोभकी द्वितीय कृष्टिसे लोभकी तृतीय कृष्टिमे प्रदेशाग्रको संक्रमित करता है। उसके पश्चात् तृतीय कृष्टिमे संक्रमित नहीं
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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