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________________ ६५२ कलाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार . १०८८. किट्टीणं परमसमयवेदगो बारसण्हं पि संगहकिट्टीणमग्गकिट्टियादि कादृण एक्कक्किस्से संगहकिट्टीए असंखेज्जदिभागं विणासेदि । १०८९. कोहस्स पडमसंगहकिट्टि मोत्तूण सेसाणमेक्कारसण्हं संगहकिट्टीणं अण्णाओ अपुवाओ किट्टीओ णिव्चत्तेदि । १०९०. ताओ अपुव्याओ किट्टीओ कदयादो पदेसग्गादो णिव्बत्तेदि ? १०९१. वज्झमाणयादो च संकामिज्जमाणयादो च पदेसग्गादो णिवत्तेदि । १०९२. वज्झमाणयादो थोवाओ णिवत्तेदि । संकामिज्जमाणयादो असंखेज. गुणाओ । १०९३. जाओ ताओ उज्झमाणयादो पदेसग्गादो णिवत्तिजंति ताओ चदुसु परमसंगहकिट्टीसु । १०९४. ताओ कदमम्मि ओगासे ? १०९५. एक्कक्किस्से संगहकिट्टीए किट्टीअंतरेसु । १०९६. किं सब्बेसु किट्टीअंतरेसु, आहो ण सव्वेसु ? १०९७. . ण सव्वेसु । १०९८. जइ ण सव्वेसु, कदमेसु अंतरेसु अपुब्बाओ णिव्यत्तयदि ? १०९९. . चूर्णिसू ०-कृष्टियोंका प्रथम समयवेदक वारहो ही संग्रहकृष्टियोके अग्रकृष्टिको आदि करके एक-एक संग्रहकृष्टि के असंख्यातवें भागको विनाश करता है, अर्थात् उतनी कृष्टियोंकी शक्तियोको अपवर्तनाघातसे प्रतिसमय अपवर्तन करके अधस्तन कृष्टिरूपसे स्थापित करता है । ( इसी प्रकार द्वितीयादि समयोमें भी अपवर्तनाघात जानना चाहिए। केवल इतना भेद है कि प्रथम समयमे विनाश की गई कृष्टियोसे द्वितीयादि समयमें विनाश की जानेवाली कृष्टियाँ उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित हीन होती हैं । ) ॥१०८८॥ __ चूर्णिसू०-संज्वलनकोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिको छोड़कर शेप ग्यारह संग्रहकृष्टियोके नीचे और अन्तरालमे अन्य अपूर्व कृष्टियोको बनाता है ॥१०८९॥ शंका-उन अपूर्व कृष्टियोको किस प्रदेशाग्रसे बनाता है ? ॥१०९०॥ समाधान-वध्यमान और संक्रम्यमाण प्रदेशाप्रसे उन अपूर्व कृष्टियोंको बनाता है ॥१०९१॥ - चूर्णिसू०-बध्यमान प्रदेशाग्रसे थोड़ी अपूर्व कृष्टियोको बनाता है । किन्तु संक्रम्यमाण प्रदेशाग्रसे असंख्यातगुणी अपूर्व कृष्टियोको बनाता है। वे जो अपूर्व कृष्टियाँ वध्यमान प्रदेशाग्रसे निर्वर्तित की जाती हैं, चारो ही प्रथम संग्रहकृष्टियोमेसे निर्वर्तित की जाती हैं ।।१०९२-१०९३॥ शंका-उन अपूर्व कृष्टियोको किस अवकाशमे अर्थात् किस अन्तरालमें निवृत्त करता है ? ॥१०९४॥ समाधान-उन अपूर्व कृष्टियोको एक-एक संग्रहकृष्टिकी अवयवकृष्टियोके अन्तरालोमें निवृत्त करता है ॥१०९५॥ . शंका-क्या सव कृष्टि-अन्तरालोमें उन अपूर्व कृष्टियोको रचता है ? अथवा सव कृष्टि-अन्तरालोमे नहीं रचता है ? ॥१०९६॥ समाधान-सव कृष्टि-अन्तरालोंमे अपूर्व कृष्टियोंको नहीं रचता है ॥१०९७।। । शंका-यदि सब कृष्टि-अन्तरालोंमें अपूर्व कृष्टियोंको नही रचता है, तो फिर किन अन्तरालोमे उन अपूर्वकृष्टियोको रचता है ? ॥१०९८॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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