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________________ ८४८ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार तराओ द्विदीओ असंखेज्जगुणाओ। १०४२. पलिदोवमवग्गमूलपसंखेज्जगुणं । १०४३. णिसे गगुणहाणिहाणंतरमसंखेज्जगुणं । १०४४. भववद्धाणं पिल्लेवणहाणाणि असंखेज्जगुणाणि । १०४५. समयपबद्धाणं णिल्लेवणहाणाणि विसेसाहियाणि । १०४६. समयपवद्धस्स कम्मद्विदीए अंतो अणुसमय-अवेदगकालो असंखेज्जगुणो। १०४७. समयपवद्धस्स कम्महिदीए अंतो अणुसमयवेदगकालो असंखेज्जगुणो । १०४८. सब्बो अवेदगकालो असंखेज्जगुणो । १०४९ सयो वेदगकालो असंखेज्जगुणो । १०५०. कम्महिदी विसेसाहिया। १०५१. णवमीए मूलगाहाए समुक्कित्तणा । (१५१) किट्टीकदम्मि कम्मे द्विदि-अणुभागेसु केलु सेसाणि । कम्माणि घुव्यबद्धाणि बज्झमाणाणुदिण्णाणि ॥२०४॥ १०५२. एदिस्से दो भासगाहाओ । १०५३. तासि समुक्त्तिणा । है । (क्योकि उनका प्रमाण पल्योपमके असंख्यातवें भाग है । ) जो समयप्रवद्ध एक समयके द्वारा निर्लेपित किये जाते हैं, वे असंख्यातगुणित हैं। समयप्रबद्ध-शेषसे विरहित ( उपलब्ध होनेवाली ) निरन्तर स्थितियाँ असंख्यातगुणित हैं। पल्योपमका प्रथम वर्गमूल असंख्यातगुणित है। निषेकोंका गुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणित है। (क्योकि, वह असंख्यात पल्योपम-प्रथमवर्गमूल प्रमाण है । ) भववद्धोके निर्लेपनस्थान असंख्यातगुणित हैं। समयप्रबद्धोंके निर्लेपनस्थान विशेप अधिक है। (इस विशेप अधिकका प्रमाण अन्तर्मुहूर्तमात्र ही है, क्योकि समयप्रबद्धोके जघन्य निर्लेपनस्थानसे ऊपर अन्तर्मुहूर्तप्रमित स्थितियोके पश्चात ही भववद्धोका जघन्य निर्लपनस्थान प्राप्त होता है। समयप्रबद्धकी कर्मस्थितिके भीतर अनुसमय अवेदककाल असंख्यातगुणित है। समयप्रवद्धकी कर्मस्थितिके भीतर अनुसमय वेदककाल असंख्यातगुणित है। सर्व अवेदककाल असंख्यातगुणित है। इससे सर्व वेदककाल असंख्यातगुणित है । ( क्योकि वह कर्मस्थितिके असंख्यात बहुभागप्रमाण है।) सर्ववेदककालसे कर्मस्थिति असंख्यातगुणित है ।।१०३८-१०५०॥ चूर्णिसू०-अब नवमी मूलगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है ॥१०५१॥ मोहनीय कर्मके निरवशेष अनुभागसत्कर्मके कृष्टिकरण करनेपर अर्थात् अकृष्टिरूपसे अवस्थित अनुभागको कृष्टिरूपसे परिणमित कर देने पर कृष्टिवेदनके प्रथम समयमें वर्तमान जीवके पूर्व बद्ध ज्ञानावरणीयादि कर्म किन स्थितियोंमें और किन अनुभागोंमें शेष अर्थात् अवशिष्ट रूपसे पाये जाते हैं ? तथा वध्यमान अर्थात् वर्तमान समयमें बँधनेवाले और उदीर्ण अर्थात् वर्तमानमें उदय आनेवाले कर्म किन-किन स्थितियों और अनुभागोंमें पाये जाते हैं ? ॥२०४॥ चूर्णिसू०-इस प्रश्नात्मक मूलगाथाके अर्थकी विभाषा करनेवाली दो भाष्यगाथाएँ हैं। अव उनकी समुत्कीर्तना की जाती है ॥१०५२-१०५३॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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