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________________ ८३१ गा० १९६] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण (१४३) जा चावि बज्झमाणी आवलिया होदि पढमकिट्टीए । पुवावलिया णियमा अणंतरा चदुस्सु किट्टीसु ॥१९६॥ ९०८. विहासा । ९०९. जं पदेसग्गं वज्झमाणयं कोधस्स तं पदेसग्गं सव्वं बंधावलियं कोहस्स परमसंगहकिट्टीए दिस्सइ । ९१०. तदो आवलियादिकंतं तिसु वि कोहकिट्टीसु दीसइ । ९११. एवं विदियावलिया चदुसु किट्टीसु दीसइ माणस्स च पहमकिट्टीए । ९१२. तदो जं पदेसग्गं कोहादो माणस्स पहमकिट्टीए गदं तं पदेसग्गं तदोआवलियाए पुण्णाए माणस्स विदिय-तदियासु मायाए च पहमसंगहकिट्टीए संकमदि । ९१३. एवं तदिया आवलिया सत्तसु किट्टीसु त्ति भण्णइ । ९१४. जं कोहपदेसग्गं संछुब्भमाणयं मायाए पडमकिट्टीए संपत्तं तं पदेसग्गं तत्तो आवलियादिकंतं मायाए विदिय-तदियासु च किट्टीसु लोभस्स च पढमकिट्टीए संकमदि । ९१५. एवं चउत्थी आवलिया दससु किट्टीसु त्ति भण्णइ । ९१६. जं कोहपदेसग्गं संछुब्भमाणं लोभस्स पहमकिट्टीए संपत्तं तदो आवलियादिक्कत लोभस्स विदियतदियासु किट्टीसु दीसह । ९१७. एवं पंचमी आवलिया सव्वासु किट्टीसु त्ति भण्णइ । जो वध्यमान आवली है, उसके कर्मप्रदेश क्रोधसंज्वलनकी प्रथम कृष्टि मे पाये जाते हैं । इस पूर्व आवलीके अनन्तर जो उपरिम अर्थात् द्वितीयावली है, उसके कर्मप्रदेश नियमसे क्रोधसंज्वलनकी तीन और मानसंज्वलनकी प्रथम, इन चार संग्रहकृष्टियोंमें पाये जाते हैं ॥१९६॥ चूर्णिसू०-अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है-संज्वलन क्रोधके जो वध्यमान प्रदेशाग्र हैं, वे सर्व बन्धावलीके प्रदेशाग्र कहलाते हैं और वे क्रोधसंज्वलनकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे दिखाई देते हैं। इसके पश्चात् एक आवली व्यतीत होनेपर वे कर्मप्रदेशाग्र क्रोधकी तीनो संग्रहकृष्टियोमे भी दिखाई देते हैं और मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे भी । इस प्रकार द्वितीय आवली चार कृष्टियोमें दिखाई देती है। तदनन्तर जो कर्मप्रदेशाग्र क्रोधसे मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिमें गया है, वह प्रदेशाग्र आवलीके पूर्ण हो जानेपर मानकी दूसरी और तीसरी तथा मायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे संक्रमित होता है। इस प्रकार तृतीय आवली सात संग्रहकृष्टियोमें दिखाई देती है, ऐसा कहा जाता है ॥९०८-९१३॥ चर्णिसू०-जो संज्वलनक्रोधके प्रदेशाग्र संक्रमित होते हुए संज्वलनमायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिको प्राप्त हुए हैं, वह प्रदेशाग्र उससे आगे एक आवली अतिक्रान्त होनेपर संज्वलनमायाकी द्वितीय और तृतीय संग्रहकृष्टिमें तथा संज्वलनलोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमे संक्रान्त होता है। इस प्रकार चौथी आवली दश कृष्टियोमे दिखाई देती है, ऐसा कहा जाता है। जो संज्वलनक्रोधके प्रदेशाग्र संक्रमित होते हुए संज्वलनलोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिको प्राप्त हुए हैं, वह प्रदेशाग्र उससे आगे एक आवली व्यतीत होनेपर संज्वलनलोभकी द्वितीय और सृतीय संग्रहकृष्टिमें दिखाई देते है। इस प्रकार पाँचवी आवली सर्व कृष्टियोमे दिखाई देती है, ऐसा कहा जाता है ॥९१४-९१७॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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