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________________ १६६ ।इस १८४ केसयिपाहुडसुत भुजाकार अल्पतर, अवस्थित और मिथ्यात्व आदि प्रकृतियोंकी अनुभागश्रवक्तव्यविभक्तिके अर्थपदका विभक्तिके उत्कृष्ट और जघन्य वर्णन १२३ अन्तरका निरूपण १६५ भुजाकार स्थिति-विभक्तिके कालका एक नाना जीवोंकी अपेक्षा अनुभाग जीवकी अपेक्षा निरूपण १२५ विभक्तिका भग-विचय १६६ भुजाकारस्थिति-विभक्तिका नाना नाना जीवोंकी अपेक्षा अनुभाग___ जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय १३० विभक्तिक काल १६८ भुजाकार स्थिति विभक्ति का नाना नाना जीवोंकी अपेक्षा अनुभागजीवोंकी अपेक्षा काल विभक्तिका अन्तर भुजाकार स्थितिविभक्तिका नाना जीवों- अनुभागविभक्तिका अल्पबहुत्व १७१ की अपेक्षा अन्तर १३१ सत्कर्मस्थानोंके भेद और उनके अल्पभुजाकार स्थितिविभक्ति के सन्निकर्पका बहुत्वका निरूपण निरूपण २३२ प्रदेश-विभक्ति १७७-२१२ भुजाकार स्थितिविभक्तिका अल्पबहुत्व १३४ प्रदेशविभक्तिके उत्तर भेदोंका निरूपण १७७ भुजाकार स्थितिविभक्तिके पदनिक्षेप मूलप्रकृति-प्रदेशविभक्तिका बाईस का वर्णन १३५ अनुयोगद्वारोंसे निरूपण , स्थितिविभक्तिके वृद्धिका निरूपण १३६ उत्तरप्रकृति-प्रदेशविभक्तिके स्वामित्वका वृद्धिकी अपेक्षा स्थितिविभक्ति के काल निरूपण का निरूपण १३७ उत्तरप्रकृति-प्रदेशविभक्तिका काल १४८ वृद्धिकी अपेक्षा अन्तरका निरूपण १३६ उत्तरप्रकति-प्रदेशविभक्तिका अन्तर वृद्धिकी अपेक्षा स्थिति विभक्तिका अल्प- . नाना जीवोंकी अपेक्षा उत्तरप्रकृतिबहुत्व १४० प्रदेशविभक्तिका भगविचय स्थितिसत्कर्मस्थानोंका निरूपण अनिवृत्ति करण आदि पदोंका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा उत्तरप्रकृति____ सम्बन्धी अल्पबहुत्व १४४ प्रदेशविभक्तिका काल और अन्तर २०० स्थितिसत्कर्मस्थानोंका अल्पवहुत्व उत्तरप्रकृति-प्रदेशविभक्तिके उत्कृष्ट प्रदेश१४५ सत्कर्मका अल्पबहुत्व २०१ अनुभाग-विभक्ति . १४७-१७६ उत्तरप्रकृति-प्रदेशविभक्तिके जघन्य प्रदेशअनुभागविभक्तिके उत्तर-भेदोंका निरूपण १४७ सत्कर्म-अल्पबहुत्वका सकारण मूल अनुभागविभक्तिका तेईस अनु निरूपण २०६ ___ योगद्वारोंसे निरूपण १५- नरकगतिमें जघन्य प्रदेशसत्कर्मके अल्पमोहनीयकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंके देश बहुत्वका निरूपण घाती सर्वघाती अशोका विभाजन १५७ एकेन्द्रियों में जघन्य प्रदेशसत्कर्मके अल्पघातिसंज्ञा और स्थानसंज्ञाके द्वारा मोह बहुत्वका निरूपण २१० कर्मके उत्तरभेदोंका निरूपण १५८ क्षीणाक्षीणाधिकार २२३-२३४ मिथ्यात्व आदि प्रकृतियोंकी अनुभाग- उत्कर्पण, अपकर्षण, संक्रमण और उदय विभक्तिका स्वामित्व-निरूपण १६० ___ की अपेक्षा काँके क्षीणस्थितिक मिथ्यात्व आदि प्रकृतियोंकी अनुभाग- और क्षीणस्थितिकका निरूपण २१३ विभक्तिके उत्कृष्ट और जघन्य उत्कर्पणादि चारो पदोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट कालका निरूपण .. १६३ क्षीणस्थितिकका स्वामित्व १४१
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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