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________________ ८०२ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार चरिमादो त्ति । ६५६. तदो पढमसमए णिबत्तिदाणं जहणियाए किट्टीए विसेसहीणमसंखेज्जदिमागेण । ६५७. तदो विदियाए अणंतभागहीणं तेण परं पडमसमयणिव्वत्तिदासु लोभस्स पडमसंगहकिट्टीए किट्टीसु अणंतराणंतरेण अणंतभागहीणं दिज्जमाणगं जाव पढमसंगहकिट्टीए चरिमकिट्टि ति। ६५८. लोभस्स चेव विदियसमए विदियसंगहकिट्टीए तिस्से जहणियाए किट्टीए दिज्जमाणगं विसेसाहियमसंखेज्जदिमागेण । ६५९. तेण परमणंतभागहीणं जाव अपुव्वाणं चरिमादो त्ति । ६६०. तदो पहमसमयणिव्वत्तिदाणं जहणियाए किट्टीए विसेसहीणमसंखेज्जदिमागेण । ६६१. तेण परं विसेसहीणमणंतभागेण जाव विदियसंगहकिट्टीए चरिमकिट्टि त्ति । ६६२. तदो जहा विदियसंगहकिट्टीए विधी तहा चेव तदियसंगहकिट्टीए विधी च । ६६३. तदो लोभस्स चरिमादो किट्टीदो मायाए जा विदियसमए जहणिया किट्टी तिस्से दिज्जदि पदेसग्गं विसेसाहियमसंखेज्जदिभागेण । ६६४ तदो पुण अणंतभागहीणं जाव अपुव्वाणं चरिमादो त्ति । ६६५. एवं जम्हि जम्हि अपुव्वाणं जहणिया किट्टी तम्हि तम्हि विसेसाहियमसंखेज्जदिभागेण अपुव्वाणं चरिमादो असंखेज्जदिभागनिर्वतमान अपूर्वकृष्टियोंकी अन्तिम कृष्टि प्राप्त होती है। उससे प्रथम समयमे निवर्तित लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिकी अन्तर-कृष्टियोमेंसे जघन्य कृष्टि में विशेष हीन अर्थात् असंख्यातवें भागसे हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। उससे द्वितीय कृष्टिमे अनन्तभागसे हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। उसके आगे प्रथम समयमे निर्वर्तित लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिकी अन्तरकृष्टियोंमें अनन्तर-अनन्तररूपसे प्रथम संग्रहकृष्टिकी अन्तिम अन्तरकृष्टि तक अनन्तभागहीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। उससे लोभकी ही द्वितीय समयमे निवर्तमान उस द्वितीय संग्रहकृष्टिकी जघन्य कृष्टिमें दीयमान प्रदेशाग्र असंख्यातवें भागसे विशेष अधिक है । उसके आगे द्वितीय संग्रहकृष्टि के नीचे निवर्तमान अपूर्व कृष्टियोकी अन्तिम कृष्टि तक अनन्तभागहीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। उससे, प्रथम समयमें निर्वर्तित पूर्वकृष्टियोकी जघन्य कृष्टिमे असंख्यातभागप्रमाण विशेष हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। इससे आगे द्वितीय संग्रहकृष्टिकी अन्तिम कृष्टि तक अनन्तवें भागसे विशेष हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है ॥६५१-६६१॥ चूर्णिसू०-तत्पश्चात् द्वितीय संग्रहकृष्टिमे जैसी विधि बतलाई गई है वैसी ही विधि तृतीय संग्रहकृष्टिमे भी जानना चाहिए । तदनन्तर लोभकी अन्तिम कृष्टिसे मायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिके नीचे द्वितीय समयमें निवर्तमान अपूर्वकृष्टियोमे जो जघन्य कृष्टि है उसमें असंख्यातवें भागसे विशेष अधिक प्रदेशाग्र दिया जाता है। पुनः इसके आगे अपूर्वकृष्टियोकी अन्तिम कृष्टि तक अनन्तभागसे हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है। इस प्रकार उपयुक्त क्रमसे जहाँ जहाँ पर पूर्वकृष्टियोंकी अन्तिम कृष्टि से अपूर्व कृष्टियोकी जघन्य कृष्टि कही गई है, वहाँ वहॉपर असंख्यातवें भागसे विशेष अधिक प्रदेशाग्र दिया जाता है और जहाँ जहॉपर अपूर्वकृष्टियोकी अन्तिम कृष्टिसे पूर्व कृष्टियोकी जघन्य कृष्टि कही गई है वहाँ वहॉपर असं
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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