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________________ गा० १६१] चारित्रमोहलपक-अश्वकर्णकरणक्रिया-निरूपण ७९१ . ५०१ जाणि पढमसमये अपुव्वफद्दयाणि णिव्वत्तिदाणि तत्थ पढमस्स फद्दयस्स आदिवग्गणा थोवा । ५०२ चरिमस्स अपुव्वफद्दयस्स आदिवग्गणा अणंतगुणा । ५०३. पुव्व कद्दयस्सादिवग्गणा अणंतगुणा । ५०४. जहा लोभस्स अपुचफद्दयाणि परूविदाणि पढपसपये, तहा मायाए माणस्स कोधस्स परूवेयवाणि ।। ५०५. पहमसमए जाणि अपुन्वफयाणि णिव्यत्तिदाणि तत्थ कोधस्स थोबाणि। ५०६. माणस्स अपुन्नफद्दयाणि विसेसाहियाणि । ५०७. मायाए अपुषफयाणि विसेसाहियाणि । ५०८. लोभस्स अपुयफद्दयाणि विसेसाहियाणि । ५०९. विसेसो अणंतभागो। ५१०. तेसिं चेव परमसमए णिव्वत्तिदाणमपुव्वफयाणं लोभस्स आदिवग्गणाए अविभागपलिच्छेदग्गं थोवं । ५११. मायाए आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं विसेसाहियं । ५१२. माणस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं विसेसाहियं । ५१३. कोहस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं विसेसाहियं । ५१४. एवं चतुण्डं स्पर्धककी प्रथमवर्गणा अपने अनन्तर नीचेके स्पर्धककी प्रथम वर्गणासे उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यातवें भागसे अधिक होकर असंख्यात भागवृद्धिके अन्तको न प्राप्त हो जावे, तब तक असंख्यात भागोत्तर वृद्धिका क्रम चालू रहता है । इसके आगे अन्तिम स्पर्धक तक अनन्त भागवृद्धिका क्रम जानना चाहिए। चूर्णिस०-प्रथम समयमे जो अपूर्वस्पर्धक निर्वर्तित किये गये, उनमे प्रथम स्पर्धक. की आदि वर्गणा अल्प है । इससे अन्तिम अपूर्वस्पर्धककी आदि वर्गणा अनन्तगुणी है । इससे पूर्वस्पर्धककी आदि वर्गणा अनन्तगुणी है। अश्वकर्णकरणके प्रथम समयमें जिस प्रकार संज्वलन लोभके अपूर्वस्पर्धकोकी प्ररूपणा की गई है, उसी प्रकार संज्वलन माया, मान और क्रोधके अपूर्वस्पर्धकोकी भी प्ररूपणा करना चाहिए ॥५०१-५०४॥ अब प्रथम समयमें निर्वृत्त चारो संज्वलन-कषायोके अपूर्वस्पर्धक-सम्बन्धी अल्पबहुत्वको कहते हैं चूर्णिस०-प्रथम समयमे जो अपूर्वस्पर्धक निवृत्त किये है, उनमे क्रोधके अपूर्वस्पर्धक सबसे कम हैं। इससे मानके अपूर्व स्पर्धक विशेष अधिक है। इससे मायाके अपूर्वस्पर्धक विशेष अधिक है और लोभके अपूर्वस्पर्धक विशेष अधिक हैं। यहाँ सर्वत्र विशेषका प्रमाण अनन्तवॉ भाग है ॥५०५-५०९॥ चूर्णिसू०-प्रथम समयमें निर्वर्तित उन्हीं अपूर्वस्पर्धकोके लोभकी आदि वर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदाग्र अल्प हैं। इससे मायाकी आदिवर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदार विशेष अधिक हैं । इससे मानकी आदि वर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदाय विशेष अधिक है और इससे क्रोधकी आदि वर्गणामें अविभागप्रतिच्छेदाम विशेष अधिक हैं। इस प्रकार पारो ही
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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