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________________ गा० १५९ ] चारित्रमोहक्षपक- उत्कर्षणादिक्रिया निरूपण ४३७. विहासा । ४३८. जा ट्ठिदी ओक्कड्डिज्जदि सा ट्ठिदी बज्झमाणियादो अधिगा वा हीणा वा तुल्ला वा । उक्कडिज्जमाणिया ट्ठिदी बज्झमाणिगादो ट्ठिदीदो तुल्ला हीणा वा, अहिया गत्थि । ४३९. तो विदियभासगाहा । ४४०. जहा | (१०६) सव्वे वि य अणुभागे ओकड्डदि जे ण आवलियपविट्टे । उकडूदि बंधसमं णिरुवक्कम होदि आवलिया ॥१५९॥ · ७८३ ४४१. विहासा । ४४२. एदिस्से गाहाए अण्णो बंधाणुलोमेण अत्थो अण्णो सम्भावदों' । ४४३. बंधाणुलोमं ताव वत्तइस्लामो । ४४४. उद्यावलियपविट्ठे अणुभागे मोत्तूण सेसे सव्वे चेव अणुभागे ओकड्डदि । एवं चेव उक्कड्डदि । चूर्णि सू० [0- इस भाष्यगाथाकी विभाषा इस प्रकार है- जो स्थिति अपकर्षित की जाती है, वह स्थिति बध्यमान स्थिति से अधिक, हीन या तुल्य होती है । किन्तु उत्कर्षण की जानेवाली स्थिति बध्यमान स्थितिसे तुल्य या हीन होती है, अधिक नही [० - अब इससे आगे दूसरी भाष्यगाथा अवतरित होती है । वह इस प्रकार है ।। ४३९-४४०।। होती ॥४३७-४३८ ॥ चूर्णिसू० उदयावलीके बाहिर स्थित सभी अर्थात् बन्ध-सदृश या उससे अधिक अनुभागका अपकर्षण करता है । किन्तु जो अनुभाग आवली - प्रविष्ट हैं, अर्थात् उदद्यावलीके अन्तःस्थित है, वह अपकर्षित नहीं करता है । बन्धसदृश अनुभागका उत्कर्षण करता है, उससे अधिकका नहीं । आवली अर्थात् बन्धावली निरुपक्रम होती है, क्योंकि वह उत्कर्षण- अपकर्षणके विना निर्व्याघातरूपसे अवस्थित रहती है || १५९ ॥ चूर्णिसू० ( ० - इस गाथाका बन्धानुलोमसे अन्य अर्थ है और सद्भावकी अपेक्षा अन्य अर्थ है । इनमें से पहले बन्धानुलोम अर्थको कहेंगे ।।४४१-४४३ ।। विशेषार्थ - गाथासूत्रमे निबद्ध पदोके अनुसार जो अर्थ किया जाता है, उसे बन्धानुलोम अर्थात् स्थूल अर्थ कहते हैं और जो गाथाके सद्भाव अर्थात् अभिप्राय, आशय या तत्त्व-निचोड़की अपेक्षा अर्थ किया जाता है, उसे सद्भाव अर्थात् सूक्ष्म अर्थ कहते हैं । अथवा स्थितिकी अपेक्षा किये जानेवाले अर्थकी बन्धानुलोम और अनुभागकी अपेक्षा किये जानेवाले अर्थकी सद्भावसंज्ञा जानना चाहिए। चूर्णिकार इनमेसे पहले गाथाके बन्धानुलोम अर्थका व्याख्यान करेंगे । चूर्णिसू० - उदयावलीमे प्रविष्ट अनुभागोको छोड़कर शेष सर्व ही अनुभागोका अपकर्षण करता है और इसी प्रकार उत्कर्षण करता है ||४४४ ॥ ^ १ गाहासुत्तपबंधानुसारेण जहसुदत्थपरूवणा बधाणुलोम णाम । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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