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________________ गा० १५४] चारित्रमोहक्षपक-संक्रमणादिक्रिया-निरूपण ७७७ (१००) संकामेदुक्कड्डदि जे असे ते अवट्टिदा होति । आवलियं से काले तेण परं होति भजिदव्वा ॥१५३॥ ३९६. विहासा । ३९७. जं पदेसग्गं परपयडीए संकमिज्जदि ठिदीहिं वा अणुभागेहिं वा उक्कड्डिज्जदि तं पदेसग्गमावलियं ण सक्को ओकड्डिदुवा, उक्कड्डिदुवा, संकामेद्वा । ३९८. एत्तो तदियाए भासगाहाए समुक्तित्तणा।। (१०१) ओकड्डदि जे अंसे से काले ते च होंति अजियव्वा । वड्डीए अवट्ठाणे हाणीए संकमे उदए ॥१५४॥ ३९९. विहासा । ४००. ठिदीहिं वा अणुभागेहिं वा पदेसग्गमोकड्डिज्जदि, तं पदेसग्गं से काले चेव ओकड्डिज्जेज्ज वा, उक्कड्डिज्जेज्ज वा, संकामिज्जेज्ज वा, उदीरिउजेज्ज वा। ४०१. एत्तो छट्ठीए मूलगाहाए समुक्त्तिणा । ४०२ तं जहा । जो कर्मरूप अंश संक्रमित, अपकर्षित, या उत्कर्षित किये जाते हैं, वे आवलीप्रमित काल तक अवस्थित रहते हैं, अर्थात् उनमें हानि, वृद्धि आदि कोई क्रिया नहीं होती है। उसके पश्चात् तदनन्तर समयमें वे भजितव्य हैं । अर्थात् संक्रमणावलीके व्यतीत होनेपर उनमें वृद्धि, हानि आदि अवस्थाएँ कदाचित् हो भी सकती हैं और कदाचित् नहीं भी हो सकती हैं ॥१५३॥ चूर्णिमू०-उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा इस प्रकार है-जो प्रदेशाग्र परप्रकृतिमे संकान्त किया जाता है, अथवा स्थिति या अनुभागके द्वारा अपवर्तित किया जाता है, वह प्रदेशाग्र एक आवलीकाल तक अपकर्पण करनेके लिए, उत्कर्षण करनेके लिए या संक्रमण करनेके लिए शक्य नहीं है ॥३९६-३९७॥ । चूर्णिसू०-अब इससे आगे तीसरी भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है ॥३९८॥ जो कर्माश अपकर्षित किये जाते हैं वे अनन्तर कालमें स्थिति आदिकी वृद्धि, अवस्थान, हानि, संक्रमण और उदय, इनकी अपेक्षा भजितव्य हैं । अर्थात् जिन कर्माशोंका अपकर्षण किया जाता है, उनके अपकर्पण किये जानेके दूसरे ही समयमें ही वृद्धि, हानि आदि अवस्थाओंका होना संभव है ॥१५४॥ चूर्णिसू०-उक्त गाथाकी विभापा इस प्रकार है जो कर्म-प्रदेशाग्र स्थिति अथवा अनुभागकी अपेक्षा अपकर्षित किया जाता है, वह कर्म-प्रदेशाग्र तदनन्तरकालमें ही अपकर्षणको भी प्राप्त किया जा सकता है, उत्कर्षणको भी प्राप्त किया जा सकता है, संक्रमणको भी प्राप्त किया जा सकता है और उदीरणाको भी प्राप्त किया जा सकता है।।३९९-४००॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे छठी मूलगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है । वह इस प्रकार है ॥४०१-४०२॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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