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________________ ७६९ 000 गा १४४] चारित्रमोहक्षपक-बन्धादि-अल्पबहुत्व निरूपण (९०) बंधेण होइ उदओ अहिओ उदएण संकमो अहिओ। गुणसेढि अणंतगुणा बोद्धव्वा होइ अणुमागे ॥१४३॥ ३३६. विहासा । ३३७. अणुभागेण बंधो थोवो । ३३८. उदओ अणंतगुणो । ३३९. संकमो अणंतगुणो । ३४०. विदियाए भासगाहाए समुकित्तणा। (९१) बंधेण होइ उदओ अहिओ उदएण संकमो अहिओ। - गुणसेढि असंखेजा च पदेसरगेण बोद्धव्वा ॥१४४॥ ३४१. विहासा । ३४२. जहा । ३४३. पदेसंग्गेण बंधो थोयो । ३४४. उदयो असंखेज्जगुणो । ३४५. संकमो असंखेज्जगुणो । बन्धसे उदय अधिक होता है और उदयसे संक्रमण अधिक होता है। इस प्रकार अनुभागके विषयमें गुणश्रेणी अनन्तगुणी जानना चाहिए ॥१४३॥ __ चूर्णिसू०-इस भाष्यगाथाकी विभाषा इस प्रकार है-अनुभागकी अपेक्षा बन्ध अल्प है, ( क्योकि, यहॉपर तत्काल होनेवाले बन्धको ग्रहण किया गया है । ) बन्धसे उदय अनन्तगुणा है। ( क्योंकि, वह चिरंतन सत्त्वके अनुभागस्वरूप है। ) उदयसे संक्रमण अनन्तगुणा है। ( इसका कारण यह है कि अनुभागसत्त्व उदयमे तो अनन्तगुणा हीन होकरके आता है किन्तु चिरंतनसत्त्वका संक्रमण तदवस्थरूपसे ही परप्रकृतिमे संक्रमित होता है ॥३३६-३३९॥ चूर्णिसू०-अब दूसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना करते है ॥३४०॥ वन्धसे उदय अधिक होता है और उदयसे संक्रमण अधिक होता है। इस प्रकार प्रदेशाग्रकी अपेक्षा गुणश्रेणी असंख्यातगुणी जानना चाहिए ॥१४४॥ चूर्णिस०-इस भाप्यगाथाकी विभाषा इस प्रकार है-प्रदेशोकी अंपेक्षा वन्ध अल्प है । बन्धसे उदय असंख्यातगुणा है और उदयसे संक्रमण असंख्यातगुणा है ॥३४१-३४५॥ विशेपार्थ-इस दूसरी भाष्यगाथाके द्वारा प्रदेश-विषयक अल्पवहुत्व बतलाया गया है। अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके उक्त स्थलपर पुरुषवेद आदि जिस किसी भी कर्मका नवकबन्ध होता है वह एक समयप्रबद्धमात्र होनेसे वक्ष्यमाण पदोसे प्रदेशोकी अपेक्षा सबसे कम है। इस बन्धसे उदय प्रदेशोकी अपेक्षा असंख्यातगुणा है, क्योकि, आयुकर्मको छोड़कर वेद्यमान जिस किसी भी कर्मका उदय गुणश्रेणी-गोपुच्छाके माहात्म्यसे असंख्यातगुणा हो जाता है। उदयरूप प्रदेशोसे संक्रमणरूप प्रदेश भी असंख्यातगुणित होते हैं, इसका कारण यह है कि जिन कर्मोंका गुणसंक्रमण होता है, उन कर्मोंका गुणसंक्रमण-द्रव्य और जिनका अधःप्रवृत्तसंक्रमण होता है, उनका अधःप्रवृत्तसंक्रमण-द्रव्य असंख्यात समयप्रवद्धप्रमाण होनेसे उदयकी अपेक्षा असंख्यातगुणा हो जाता है। ९७
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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