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________________ ७५५ मा० १२३] चारित्रमाहभपक-विशेषक्रिया-निरूपण कम्माणं] ठिदिबंधे ठिदिखंडए च पुण्णे पुण्णे ठिदिवंध-ठिदिसंतकम्माणि संखेज्जगुणहीणाणि । २४०. णामा-गोद-वेदणीयाणं पुण्णे ठिदिखंडए असंखेज्जगुणहीणं ठिदिसंतकम्मं । २४१. एदेसि चेव ठिदिवंधे पुण्णे अण्णो ठिदिबंधो संखेज्जगुणहीणो । २४२ एदेण कमेण ताव जाव सत्तण्हं णोकसायाणं संकामयस्स चरिमद्विदिबंधो त्ति । २४३ सत्तण्हं णोकसायाणं संकांमयस्स चरिमो ठिदिवंधो पुरिसवेदस्स अट्ट वस्साणि । २४४ संजलणाणं सोलस वस्साणि । २४५ सेसाणं कम्माणं संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि ठिदिबंधो। २४६. ठिदिसंतकम्मं पुण घादिकम्माणं चदुण्हं पि संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । २४७. णामा-गोद-वेदणीयाणमसंखेज्जाणि वस्साणि । २४८. अंतरादो दुसमयकदादो पाए छण्णोकसाए कोधे संछुह दि, ण अण्णम्हि कम्हि वि । २४९.पुरिसवेदस्स दो आवलियासु पढमहिदीए सेसासु आगाल-पडि आगालोवोच्छिण्णो। पढमद्विदीदो चेव उदीरणा । २५० समयाहियाए आवलियाए सेसाए जहणिया ठिदि उदीरणा । २५१. तदो चरिमसमयसवेदो जादो । २५२. ताधे छण्णोकसाया संछुद्धा । २५३. पुरिसवेदस्स जाओ दो आवलियाओ समयूणाओ एत्तिगा समयपबद्धा विदियठिदीए अत्थि, उदयहिदी च अत्थि । सेसं पुरिसवेदस्स संतकम्मं सव्वं संछुद्धं । २५४. से काले अस्सकण्णकरणं* पवत्तिहिदि । और स्थितिकांडकके पूर्ण होनेपर स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित हीन होते जाते हैं । स्थितिकांडकके पूर्ण होनेपर नाम, गोत्र और वेदनीयका अन्य स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा हीन हो जाता है। तथा इन्हीं कर्मोंके स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा हीन हो जाता है । इस क्रमसे तव तक जाते हैं, जब तक कि सात नोकपायोके संक्रामकका अन्तिम स्थितिबन्ध प्राप्त होता-है ॥२३७.२४२॥ चर्णिस०-सात नोकषायोके संक्रामकके पुरुषवेदका अन्तिम स्थितिवन्ध आठ वर्ष है। संज्वलन कषायोका स्थितिबन्ध सोलह वर्षप्रमाण है । शेप कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष है । किन्तु चारो ही घातिया कर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्ष है। नाम, गोत्र और वेदनीयका असंख्यात वर्ष है। द्विसमयकृत अन्तरके स्थलसे आगे छह नोकषायोको क्रोधमें संक्रान्त करता है, अन्य किसी प्रकृतिमे नही। पुरुषवेदकी प्रथमस्थितिमें दो आवलियोंके शेष रह जानेपर आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते है। प्रथमस्थितिसे ही उदीरणा होती है। एक समय अधिक आवलीके शेष रहनेपर जघन्य स्थिति-उदीरणा होती है। तत्पश्चात् वह चरमसमयवर्ती सवेदी हो जाता है । उस समय छह नोकषाय संक्रान्त हो जाते हैं। पुरुषवेदकी एक समय कम दो आवलिया हैं, उतने मात्र समयप्रवद्ध द्वितीयस्थितिमें है और उदयस्थिति भी है, शेष सब पुरुषवेदका स्थितिसत्त्व संक्रान्त हो जाता है । तदनन्तरकालमे वह अश्वकर्णकरणमे प्रवृत्त होगा ।।२४३-२५४॥ * अश्वत्य कर्णः अश्वकर्णः, अश्वकर्णवत्करणमम्वकर्णकरणम् । ययाश्वकर्णः अग्रात्प्रभृत्यामूलात्
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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