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________________ गा० १२३] चारित्रमोहक्षपक-विशेषक्रिया-निरूपण ७५३ उकीरिज्जमाणे द्विदिबंधो पबद्धो जं च ठिदिखंडयं जाव अंतरकरणद्धा एदाणि समगं णिढाणियमाणाणि णिद्विदाणि । २१४. से काले [अंतर-] परमसमय-दुसमयकदं । २१५. ताधे चेव णबुंसयवेदस्स आजुत्तकरणसंकामगो, मोहणीयस्स संखेज्जवस्सद्विदिगो बंधो, मोहणीयस्स एगट्ठाणिया बंधोदया, जाणि कम्माणि वझंति तेसिं छसु आवलियासु गदासु उदीरणा, मोहणीयस्स आणुपुव्वीसंकमो, लोहसंजलणस्स असंकमो एदाणि सत्त करणाणि अंतर-दुसमयकदे आरद्धाणि । २१६. तदो संखेज्जेसु द्विदिखंडयसहस्सेसु गदेसु णबुंसमवेदो संकामिज्जमाणो संकामिदो।। २१७. तदो से काले इत्थिवेदस्स पडमसमयसंकामगो। २१८. ताधे अण्णं द्विदिखंडयमण्णमणुभागखंडयमण्णो द्विदिवंधो च आरद्धाणि । २१९. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण इत्थिवेदक्खवणद्धाए संखेज्जदिमागे गदे णाणावरण-दसणावरण-अंतराइयाणं तिण्डं घादिकम्माणं संखेज्जवस्सहिदिगो बंधो । २२०. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण इत्थिवेदस्स जं हिदिसंतकम्मं तं सचमागाइदं । २२१. सेसाणं कम्माणं द्विदिसंतकम्मस्स तत्सम्बन्धी स्थितिकांडक और अन्तरकरणकाल, समाप्त किये जानेवाले ये सब एक साथ समाप्त हो जाते है। तदनन्तर कालमें अन्तर-प्रथमसमयकृत और अन्तर-द्विसमयकृत होता है ॥२०७-२१४॥ विशेषार्थ-जिस समयमें अन्तरसम्बन्धी चरमफाली नष्ट होती है, उस समय उसे प्रथमसमयकृत-अन्तर कहते हैं और तदनन्तर समयमें उसे द्विसमयकृत-अन्तर कहते है । चूर्णिसू०-उसी समय ही अर्थात् अन्तरसम्बन्धी चरमफालीके पतन होनेपर नपुंसक वेदका आयुक्तकरण-संक्रामक होता है, अर्थात् नपुंसकवेदकी क्षपणामे प्रवृत्त होता है ( १ ) । उसी समय मोहनीयका संख्यात वर्पवाला स्थितिबन्ध (२), मोहनीयका एकस्थानीय बन्ध और उदय ( ३-४ ), जो कर्म बंधते हैं, उनकी छह आवलियोके व्यतीत होनेपर उदीरणा ( ५ ), मोहनीयका आनुपूर्वी संक्रमण ( ६ ) और लोभके संक्रमणका अभाव (७), ये सात करण द्विसमयकृत-अन्तरमे एक साथ प्रारम्भ होते हैं। तत्पश्चात् संख्यात सहस्र स्थितिकांडकोके व्यतीत हो जानेपर संक्रमणको प्राप्त कराया जानेवाला नपुंसकवेद पुरुपवेदमे संक्रान्त हो जाता है ॥२१५-२१६॥ चूर्णिसू०-तदनन्तर समयमे वह स्त्रीवेदका प्रथमसमयवर्ती संक्रामक होता है । उस समय अन्य स्थितिकांडक, अन्य अनुभागकांडक और अन्य स्थितिबन्ध प्रारम्भ होते है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा स्त्रीवेदके क्षपणा-कालका संख्यातवॉ भाग व्यतीत होनेपर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय, इन तीन धातिया कर्मों का संख्यात वर्षकी स्थितिवाला वन्ध होता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा स्त्रीवेदका जो स्थितिसत्त्व है, वह सब क्षपण करनेके लिए ग्रहण कर लिया जाता है । तथा शेष कर्मों के स्थितिसत्त्वका असंख्यात वहुभाग भी क्षपणाके लिए ग्रहण कर लिया जाता है। उस स्थितिकांडकके पूर्ण होनेपर संक्रम्यमाण ९५
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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