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________________ ७४२ कखाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार अपुन्यकरणे जाव चरिमादो ठिदिखंडयादो ति तदिमादो तदिम संखेज्जगुणं। ४८. एसा द्विदिखंडयपरूवणा अपुवकरणे । - ४९. अपुब्धकरणस्स परमसमये जाणि आवासयाणि ताणि वत्तइस्सामो । ५०. तं जहा । ५१. विदिखंडयमागाइदं पलिदोवमस्स संखेज्जदिमागो अप्पसत्थाणं कम्माणमणंता आगा अणुभागखंडयमागाइदं । ५२. पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो हिदिवंधेण ओसरिदो । ५३. गुणसेही उदयावलियबाहिरे णिक्खित्ता अपुवकरणद्धादो अणियट्टिकरणद्धादो च बिसेसुत्तरकालो । ५४. जे अप्पसत्थकम्मंसा ण बन्झति, तेसि कम्माणं गुणसंकयो जादो। ५५ तदो द्विदिसंतकम्म हिदिवंधो च सागरोवमकोडिसदसहस्सपुधत्तमंतोकोडाकोडीए । बंधादो पुण संतकम्मं संखेज्जगुणं । ५६. एसा अपुवकरणपडमसमए परूषणा । ५७. एत्तो विदियसमए णाणत्तं । ५८. तं जहा। ५९. गुणसेही असंखेज्जगुणा । सेसे च णिक्खेवो । विसोही च अणंतगुणा । सेसेसु आवासएसु णत्थि णाणत्तं । ६०. एवं जाब पढमाणुभागखंडयं समत्तं ति । ६१. से काले अण्णमणुभागखंडयमागाइदं सेसस्स अणंता भागा। ६२. एवं संखेज्जेसु अणुभागखंडयसहस्सेसु गदेसु अण्णमणुसर्व कालमें अन्तिम स्थितिकांडक तक एकसे दूसरा संख्यातगुणित जानना चाहिए । इस प्रकार यह अपूर्वकरणमें स्थितिकांडककी प्ररूपणा की गई ॥४७-४८॥ चूर्णिसू०-अपूर्वकरणके प्रथम समयमें जो आवश्यक होते हैं, उन्हे कहेगे। वे इस प्रकार हैं-आयुकर्मको छोड़कर शेष कर्मों के स्थितिकांडक पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण ग्रहण करता है । अनुभागकांडक अप्रशस्त कर्मों के अनन्त बहुभागप्रमाण ग्रहण करता है । पल्योपसका संख्यातवाँ भाग स्थितिबन्धसे घटाता है। उदयावलीके बाहिर निक्षिप्त गुणश्रेणी अपूर्वकरणकाल और अनिवृत्तिकरणकालसे विशेष अधिक है । जो अप्रशस्त कर्म नहीं बँधते हैं, उस कर्मों का गुणसंक्रमण होता है । तदनन्तर स्थितिसत्त्व और स्थितिवन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ी अर्थात् सागरोपमकोटिशतसहस्रप्रमाण होता है। किन्तु वन्धसे सत्त्व संख्यातगुणा होता है । यह अपूर्वकरणके प्रथम समयमे आवश्यकोंकी प्ररूपणा हुई ॥४९-५६॥ चूर्णिस०-अव इससे आगे द्वितीय समयमें जो विभिन्नता है, उसे कहते हैं । वह इस प्रकार है-यहाँ गुणश्रणी असंख्यातगुणी है। शेषमें निक्षेप करता है और विशुद्धि अनन्तगुणी है। शेप आवश्यकोमें कोई विभिन्नता नहीं है । यह क्रम प्रथम अनुभागकांडकके समाप्त होने तक जानना चाहिए। तदनन्तरकालमें अन्य अनुभागकांडकको ग्रहण करता है जो कि घात करनेसे शेप रहे अनुभागके अनन्त बहुभागप्रमाण हैं। इस प्रकार संख्यात सहस्र ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'अपुवकरणद्धादो अणियट्टिकरणद्धादो च विसेसुत्तरकोलो' इतने सूत्रागको टीकाका अंग बना दिया गया है । (देखो पृ० १९५१) ताम्रपत्रवाली प्रतिमें यह पूरा सूत्र सूत्राङ्क ५३ की टीकाके अन्तर्गत मुद्रित है (देखो पृ० १९५१)। पर इस स्थलकी टीकासे ही उसकी सुचता सिद्ध है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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