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________________ ७३४ कसाय पाहुड सुत्त [ १४ चारित्र मोह - उपशामनाधिकार गुणसेडणिक्खेवो विसेसाहिओ । ६५१. उबसामगस्स अपुव्वकरणस्स पढमसमयगुणसे डिणिक्खेवो विसेसाहिओ । ६५२. उसामगस्स कोधवेदगद्धा संखेज्जगुणा । ६५३. अधापवत्तसंजदस्त गुण सेडिणिक्खेवो संखेज्जगुणो । ६५४. दंसणमोहणीयस्स उवसंतद्धा संखेज्जगुणा । ६५५. चारित्तमोहणीयमुवसामगो अंतरं करेंतो जाओ द्विदीओ उक्कीरदि ताओ द्विदीओ संखेज्जगुणाओ । ६५६. दंसणमोहणीयस्स अंतरद्विदीओ संखेज्जगुणाओ । ६५७. जहणिया आचाहा संखेज्जगुणा । ६५८. उक्कस्सिया आवाहा संखेज्जगुणा । ६५९. उवसामगस्स मोहणीयस्स जहण्णगो विदिबंधो संखेज्जगुणो । ६६०. पडिवदमाणयस्स मोहणीयस्स जहणओ द्विदिबंधो संखेज्जगुणो । ६६१. उवसामगस्स णाणावरण- दंसणावरण-अंतराइयाणं जहण्णओ डिविंधो संखेज्जगुणो । ६६२. एदेसिं चेव कस्माणं पडिवमाणयस्स जहणो द्विदिबंधो संखेज्जगुणो । ६६३. अंतोमुहृत्तो संखेज्जगुणो । ६६४. उवसामगस्स जहण्णगो गामा-गोदाणं ठिदिबंधो संखेज्जगुणो । ६६५. वेदणीस जण्णगोट्ठिदिबंधो विसेसाहिओ | ६६६. पडिवदमाणगस्त णामा-गोदाणं जहणो द्विविधो विसेसाहियो । ६६७. तस्सेव वेदणीयस्स जहण्णगो हिदिबंधो विसेसाहिओ । ६६८. उवसाययस्स मायासंजलणस्स जहण्णगो हिदिबंधो मासो । ६६९. अपूर्वकरणका काल विशेष अधिक है (४३) । गिरनेवालेके उत्कृष्ट गुणश्रेणीनिक्षेप विशेष अधिक है (४४) ||६४०-६५०॥ चूर्णिसू० - गिरनेवालेके गुणश्रेणीनिक्षेपसे उपशामक अपूर्वकरणके प्रथम समयका गुणश्रेणीनिक्षेप विशेप अधिक है (४५) । उपशामकका क्रोधवेदककाल संख्यातगुणा है (४६) । अधःप्रवृत्तसंयतका गुणश्रेणीनिक्षेप संख्यातगुणा है (४७) | दर्शनमोहनीयका उपशान्तकाल संख्यातगुणा है (४८) | चारित्रमोहनीयका उपशामक अन्तर करता हुआ जिन स्थितियोका उत्कीरण करता है वे स्थितियों संख्यातगुणी है (४९) । दर्शनमोहनीयकी अन्तरस्थितियाँ संख्यातगुणी हैं (५०) । जघन्य आवाधा संख्यातगुणी है (५१) । उत्कृष्ट आवाधा संख्यातगुणी है (५२) । उपशामकसे मोहनीयका जघन्य स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है (५३) । गिरनेवालेके मोहनीयका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (५४) । उपशामकके ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका जघन्य स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है (५५) । गिरनेवालेके इन्ही कर्मों का जघन्य स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है (५६) । इससे अन्तर्मुहूर्त संख्यातगुणा है (५७) ॥६५१-६३३॥ 0 चूर्णिम् ० - अन्तर्मुहूर्तसे उपशामकके नाम और गोत्र कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है ( ५८ ) । वेदनीयका जघन्य स्थितिबन्ध विशेष अधिक है (५९) । गिरने - वालेके नाम और गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ( ६० ) । उसीके वेदनीयका जघन्य स्थितिबन्ध विशेष अधिक है (६१) । उपशामकके संज्वलन मायाका जवन्य
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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