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________________ गा० १२३ पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ७३३ ६२६. पडिवदमाणगस्स पाणवेदगद्धा विसेसाहिया । ६२७. तस्सेव पडिवदमाणगस्स माणवेदगस्स णवण्हं कम्माणं गणसेडिणिस्खेबो विसेसाहिओ । ६२८. उवसामगस्स मायावेदगद्धा विसेसाहिया । ६२९. मायाए पडमद्विदी विसेसाहिया । ६३०. मायाए उवसामणद्धा विसेसाहिया । ६३१. उवसामगस्स माणवेदगद्धा विसेसाहिया । ६३२. माणस्स पढमहिदी विसेसाहिया । ६३३. माणस्स उवसायणद्धा विसेसाहिया । ६३४. कोहस्स उवसामणद्धा विसेसाहिया । ६३५ छण्णोकसायाणमुवसामणद्धा विसेसाहिया । ६३६. पुरिसवेदस्स उवसामणद्धा विसेसाहिया । ६३७. इस्थिवेदस्स उवसामणद्धा विसेसाहिया । ३६८. णवंसयवेदस्स उवसामणद्धा विसेसाहिया । ६३९. खुद्दाभवग्गहणं विसेसाहियं । ६४०. उवसंतद्धा दुगुणा । ६४१. पुरिसवेदस्स पढमहिदी विसेसाहिया । ६४२. कोहस्स पढमहिदी विसेसाहिया । ६४३. मोहणीयस्स उवसामणद्धा विसेसाहिया। ६४४. पडिवदमाणगस्स जाव असंखेज्जाणं समयपबद्धाणमुदीरणा सो कालो संखेज्जगुणो । ६४५. उवसायगस्स असंखेज्जाणं समयपवद्धाणमुदीरणकालो विसेसाहिओ। ६४६. पडिवदमाणयस्स अणियट्टिअद्धा संखेज्जगुणा । ६४७. उवसामगस्स अणियट्टिअद्धा विसेसाहिया । ६४८. पडिवदमाणयस्स अपुव्वकरणद्धा संखेज्जगुणा । ६४९. उवसामगस्स अपुव्यकरणद्धा विसेसाहिया । ६५० पडिवदमाणगस्स उक्कस्सओ चूर्णिसू०-छह कर्मोंके गुणश्रेणी-निक्षेपसे गिरनेवालेके मानका वेदककाल विशेष अधिक है (२०)। उसी गिरनेवाले मानवेदकके नवो कर्मों का गुणश्रेणीनिक्षेप अधिक है (२१)। उपशामकका मायावेदककाल विशेष अधिक है (२२) । मायाकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (२३) । मायाका उपशामनकाल विशेष अधिक है (२४)। उपशामकका मानवेदककाल विशेष अधिक है (२५) । मानकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (२६) । मानका उपशामनकाल विशेष अधिक है (२७) । क्रोधका उपशामनकाल विशेप अधिक है (२८) । छह नोकषायोका उपशामनकाल विशेष अधिक है (२९) । पुरुषवेदका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३०)। स्त्रीवेदका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३१) । नपुंसकवेदका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३२) । क्षुद्रभवग्रहण विशेष अधिक है (३३) ॥६२५-६३९॥ चूर्णिसू०-क्षुद्रभवके ग्रहणकालसे उपशान्तकाल दुगुना है (३४)। पुरुपवेदकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (३५)। क्रोधकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (३६) । मोहनीयका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३७) । गिरनेवालेके जब तक असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा होती है, तब तकका वह काल संख्यातगुणा है (३८)। उपशामकके असंख्यात समयप्रवद्धोकी उदीरणाका काल विशेप अधिक है (३९)। गिरनेवालेके अनिवृत्तिकरणका काल संख्यातगुणा है (४०)। उपशामकके अनिवृत्तिकरणका काल विशेप अधिक है. (४१) गिरनेवालेके अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणा है (४२) । उपशामकके
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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