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________________ गा० १२३ ] पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ७३१ ५९६. इत्थिवेदेण उवढिदस्स णाणत्तं वत्तइस्सामो । ५९७. तं जहा । ५९८. अवेदो सत्तकम्मसे उवसामेदि । सत्तण्हं पि य उवसायणद्धा तुल्ला । ५९९. एदंणाणत्तं । सेसा सव्वे वियप्पा पुरिसवेदेण सह सरिसा ।। ६००. णवंसयवेदेणोवह्रिदस्स उवसामगल्स गाणत्तं वत्तइस्सामो । ६०१. तं जहा। ६०२. अंतरदुसमयकदे णबुसयवेदमुवसामेदि । जा पुरिसवेदेण उवट्टिदस्स णवुसयवेदस्स उवसामणद्धा तदेही अद्धा गदा ण ताव णसयवेदमुवसामेदि । तदो इत्थिवेदं उवसामेदि, णवुसयवेदं पि उवसामेदि चेव । तदो इत्थिवेदस्स उवसामणद्धाए पुण्णाए इत्थिवेदो च णवुसयवेदो च उवसामिदा भवंति । ताधे चेव चरिमसमए सवेदो भवदि । तदो अवेदो सत्त कम्पाणि उवसामेदि । तुल्ला च सत्तण्हं पि कम्माणमुवसामणा । ६०३. एदं णाणत्तं णबुसयवेदण उवद्विदस्स । सेसा वियप्पा ते चेत्र कायव्वा । ६०४. एत्तो पुरिसवेदेण सह कोहेण उवट्ठिदस्स उवसामगस्स पहमसमयअपुन्यकरणमादि कादण नाव पडिवदमाणगस्स चरिपसमयअपुव्व करणो त्ति एदिस्से अद्धाए जाणि कालसंजुत्ताणि पदाणि तेसिमप्पाबहुअं वत्तइस्सामो। ६०५. तं जहा । ६०६. चूर्णिस०-अब स्त्रीवेदसे श्रेणी चढ़नेवाले जीवकी विभिन्नता कहते हैं। वह इस प्रकार है-स्त्रीवेदके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़ा हुआ जीव अपगतवेदी होकर सात कर्मप्रकृतियोंको उपशमाता है। सातोका ही उपशमनकाल तुल्य है । यहाँ इतनी ही विभिन्नता है, शेप सर्व विकल्प पुरुषवेदके सदृश है ॥५९६-५९९॥ चूर्णिसू०-अब नपुंसकवेदसे श्रेणी चढ़नेवाले उपशामककी विभिन्नता कहते हैं। वह इस प्रकार है-अन्तर करनेके पश्चात् दूसरे समयमें नपुंसकवेदको उपशमाता है। पुरुपवेदके उदयसे श्रेणी चढ़नेवाले जीवके जो नपुंसकवेदका उपशासनकाल है, उतना काल बीत जाता है, तब तक नपुंसकवेदको नहीं उपशमाता है। तत्पश्चात् स्त्रीवेदको उपशामता है और नपुंसकवेदको भी उपशमाता है। पुनः स्त्रीवेदके उपशामनकालके पूर्ण होनेपर स्त्रीवेद और नपुंसकवेद दोनो ही उपशान्त हो जाते हैं । तभी ही यह चरमसमयवर्ती सवेदी होता है । पुनः अपगतवेदी होकर सात कर्मों को उपशामता है । सातो कर्मों की उपशामना समान है। यह नपुंसकवेदसे श्रेणी चढ़नेवाले जीवकी विभिन्नता है। शेप विकल्प वे ही अर्थात् पुरुषवेदके सदृश ही निरूपण करना चाहिए ॥६००-६०३॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे पुरुषवेदके साथ क्रोधके उदयसे श्रेणी चढ़नेवाले उपशामकके अपूर्वकरणके प्रथम समयको आदि लेकर गिरते हुए अपूर्वकरणके अन्तिम समय तक इस मध्यवर्ती कालमें जो कालसंयुक्त पद है उनके अल्पवहुत्वको कहते हैं । वह इस 8 ताम्रपत्रवाली प्रतिमे इस सूत्रके 'सरिसा' पदके आगे 'एत्तियमेत्तो चेव एत्थतणो विसेसो' इतना टीकाश भी सूत्ररूपसे मुद्रित है । ( देखो पृ० १९२४)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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