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________________ ७२१ गा० १२३] पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण गुणो । ४७३. णामा-गोदाणं द्विदिबंधो असंखेज्जगुणो । ४७४. वेदणीयस्स हिदिबंधो विसेसाहिओ । ४७५. जाधे घादिकम्माणमसंखेज्जवस्सद्विदिगो बंधो ताधे चेव एगसमएण णाणावरणीयं चउन्विहं दसणावरणीयं तिविहं पंचंतराइयाणि एदाणि दुहाणियाणि बंधेण जादाणि । ४७६. तदो संखेज्जेसु द्विदिवंधसहस्सेसु गदेसु णबुंसयवेदमणुवसंतं करेदि । ४७७ ताधे चेव णqसयवेदमोकड्डियूण आवलियबाहिरे गुणसेहिं णिक्खिवदि । ४७८. इदरेसिं कम्माणं गुणसेढिणिक्खेवेण सरिसो गुणसेडिणिक्खेवो । सेसे सेसे च णिक्खेवो । ४७९. णसयवेदे अणुवसंते जाव अंतरकरणद्धाणं ण पावदि एदिस्से अद्धाए संखेज्जेसु भागेसु गदेसु मोहणीयस्स असंखेज्जवस्सिओ द्विदिबंधो जादो । ४८०. ताधे चेव दुहाणिया बंधोदया । ४८१. सव्वस्स पडिवदमाणगस्स छसु आवलियासु गदासु उदीरणा इदि णत्थि णियमो, आवलियादिकंतमुदीरिज्जति । और गोत्र कर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा है। इससे वेदनीय कर्मका स्थितिवन्ध विशेप अधिक होता है । जिस समय तीन घातिया कर्मोंका असंख्यात वर्षकी स्थितिवाला वन्ध होता है, उस समय ही एक समयमे चार प्रकारका ज्ञानावरणीय, तीन प्रकारका दर्शनावरणीय और पॉचों अन्तराय कर्म, ये अनुभागबन्धकी अपेक्षा द्विस्थानीय अर्थात् लता और दारुरूप अनुभाग बन्धवाले हो जाते हैं । तत्पश्चात् संख्यात सहस्र स्थितिबन्धोके व्यतीत होनेपर नपुंसकवेदको अनुपशांत करता है । उसी समयमें नपुंसकवेदका अपकर्षण करके उदयावलीके बाहिर गुणश्रेणी रूपसे निक्षिप्त करता है। यह गुणश्रेणीनिक्षेप अन्य कर्मोंके गुणश्रेणीनिक्षेपके सदृश होता है । शेप शेषमें गुणश्रेणी निक्षेप होता है ॥४७०-४७८॥ ___ चूर्णिमू०-नपुंसकवेदके अनुपशान्त होनेपर जब तक अन्तरकरण-कालको नही प्राप्त करता है, तब तक इस मध्यवर्ती कालके संख्यात बहुभागोके बीत जानेपर मोहनीय कर्मका स्थितिवन्ध असंख्यात वर्षप्रमाण होने लगता है। उसी समय ही मोहनीय कर्मका बन्ध और उदय अनुभागकी अपेक्षा द्विस्थानीय हो जाता है । ग्यारहवें गुणस्थानसे गिरनेवाले सभी जीवोके छह आवलियोके वीत जानेपर ही उदीरणा हो, ऐसा नियम नहीं है, किन्तु बन्धावलीके व्यतीत होनेपर उदीरणा होने लगती है ॥४७९-४८१।। विशेषार्थ-उपशमश्रणी चढ़नेवाले जीवके लिए यह नियम बतलाया गया था कि नवीन बंधनेवाले कर्मोंकी उदीरणा वधावलीके छह आवलीकालके पश्चात् ही हो सकती है, उससे पूर्व नही। किन्तु श्रेणीसे उतरनेवालोके लिए यह नियम नहीं है। उनके बन्धावलीके पश्चात् ही बंधे हुए कर्मकी उदीरणा होने लगती है। कुछ आचार्य इस चूर्णिसूत्रका ऐसा व्याख्यान करते हैं कि ग्यारहवें गुणस्थानसे गिरते समय भी जब तक मोहनीय कर्मका संख्यात वपंप्रमाण स्थितिवन्ध होता है, तब तक तो छह आवलियोके बीतनेपर ही उदीरणाका नियम रहता है। किन्तु जव मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यात वर्षप्रमाण होने लगता है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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