SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 818
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७१० कसाय पाड सुत्त [ १४ चारित्रमोह - उपशामनाधिकार सामेदि । ३१८. तदो तिविदो कोहो उवसपदि । ३१९ तदो तिविहो माणो उवसपदि । ३२०. तढ़ी तिविहा माया उवसमदि । ३२१. तदो तिविहो लोहो उवसमदि किट्टीवज्जो । ३२२. किड्डीसु लोभसंजलणमुवसमदि । ३२३. तदा सव्वं मोहणीयमुवसंतं भवदि । ३२४. कदिभावमाविज्जदि संकमणमुदीरणा च कदिभागोत्ति विद्यासा । ३२५. तं जहा । ३२६. जं कम्पमुवसामिज्जदि तमंतोमुहुत्तेण उवसामिज्जदि । तस् जं पढमसमए उवसामिज्जदि पदेसग्गं तं थोवं । विदियसमए उवसामिज्जदि पदेसग्गमसंखेज्जगुणं । एवं गंतॄण चरिमसमए पदेसग्गस्त असंखेज्जा भागा उवसामिज्जति । ३२७. एवं सव्वकम्माणं । ३२८. द्विदीओ उदद्यावलियं बंधावलियं च मोत्तृण सेसाओ सव्वाओं समये समये उवसामिज्जति । ३२९. अणुभागाणं सव्वाणि फछ्याणि सव्वाओ वग्गणाओ उवसामिज्जति । ३३० ण सयवेदस्स पढपसमय उवसामगस्स जाओ द्विदीओ बज्झति ताओ थोवाओ । ३३१. जाओ संकामिज्जति ताओ असंखेज्जगुणाओ । ३३२. जाओ उस समय होप कर्म अनुपशान्त रहते हैं । नपुंसकवेदके उपशमके पश्चात् स्त्रीवेद उपशमको प्राप्त होता है | स्त्रीवेदके उपशमके पश्चात् सात नोकपाय उपशमको प्राप्त होते हैं । सात नोकपायोके उपशमके पश्चात् तीन प्रकारका क्रोध उपशमको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् तीन प्रकारका मान उपशमको प्राप्त होता है । तदनन्तर तीन प्रकारकी माया उपशमको प्राप्त होती है । तदनन्तर कृष्टियोको छोड़कर तीन प्रकारका लोभ उपशमको प्राप्त होता है । पुनः कृष्टियों में प्राप्त संज्वलन लोभ उपामको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् सर्व मोहनीय कर्म उपशान्त हो जाता है ।। ३१३-३२३॥ चूर्णिस० - ' चारित्रमोहनीय कर्मका कितना भाग उपशमको प्राप्त करता है, कितना भाग संक्रमण और उदीरणा करता है, इस द्वितीय गाथाकी विभापा की जाती है । वह इस प्रकार है- जो कर्म उपशमको प्राप्त कराया जाता है, वह अन्तर्मुहूर्त के द्वारा उपशान्त किया जाता है । उस कर्मका जो प्रदेशाय प्रथम समय में उपशमको प्राप्त कराया जाता है, वह सबसे कम है । द्वितीय समयमे जो उपशान्त किया जाता है, वह असंख्यातगुणा है । इस क्रमसे जाकर अन्तिम समय में कर्मप्रदेशाके असंख्यात बहुभाग उपशान्त किये जाते हैं । इस प्रकार सर्व कर्मोंका क्रम जानना चाहिए ॥ ३२४-३२७ ॥ 2 चूर्णिस० - उदयावली और बन्धावलीको छोड़कर शेष सर्व स्थितियाँ समय- समय, अर्थात् प्रतिसमय उपशान्त की जाती हैं। अनुभागोके सर्व स्पर्धक और सर्व वर्गणाएँ उपशान्त की जाती हैं । नपुंसकवेदका उपशमन करनेवाले प्रथमसमयवर्ती जीवके जो स्थितियाँ बॅधती हैं वे सबसे कम हैं। जो स्थितियाँ संक्रान्त की जाती हैं वे असंख्यातगुणी * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'तस्स' के स्थानपर 'जस्स' पाठ है। (देखो पृ० १८७७ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy