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________________ गा० १२३ । चारित्रमोह- उपशामक विशेष क्रिया निरूपण २७९. जे दो आवलियबंधा दुसमणा ते वि उवसामेदि । २८० . जा उदयावलिया छंडिदा सा थिबुकसंक्रमेण किट्टी विपच्चिहिदि । २८१ विदियसमए उदिणणं किट्टीणमग्गग्गादो असंखेज्जदिभागं मुंचदि दो अपुव्यमसंखेज्जदि - पडिभागमाफुंददि' | एवं जाब चरिमसमय सुहुमसां पराइयो त्ति । २८२. चरिमसमयसुहुमसां पराइयस्स णाणावरण - दंसणावरण-अंतराइयाणमंतो मुहुत्तिओ ट्ठदिबंधो । २८३. णामागोदाणं द्विदिबंधो सोलस मुहुत्ता । २८४. वेदणीयस्स विदिबंधो चडवीस मुहुत्ता | २८५. से काले सव्वं मोहणीयमुवसंतं । ७०५ २८६. तदो पाए तो मुहुतमुवसंत कसायवीदरागो । २८७, सव्विस्से उवसंतद्धाए अवट्ठिदपरिणामो । २८८. गुणसेढिणिक्खेवो उवसंतद्धार संखेज्जदिभागो । २८९. सव्विस्से उवसंतद्धा गुणसेढिणिक्खेवेण वि पदेसग्गेण वि अवट्टिदा । २९०. परमे गुणसेडिसीस उणे उक्कस्सओ पदेसुदओ । २९१. केवलणाणावरण- केवलदंसणावर चूर्णिम् ० - असंख्यातगुणित श्रेणीमे जो दो समय कम दो आवलीप्रमाण समय प्रबद्ध थे, उन्हे भी उपशान्त करता है । जो स्पर्धकगत उच्छिष्टावली वादरसाम्परायिकके द्वारा पहले छोड़ दी गई थी, वह अब कृष्टिरूपसे परिणमित होकर स्तिबुकसंक्रमण के द्वारा कृष्टियोमे विपाकको प्राप्त होगी । द्वितीय समयमे, वह प्रथम समयमे उदीर्ण कृष्टियोंके अग्राग्रसे, अर्थात् सर्वोपरि कृष्टिसे लेकर अधस्तन असंख्यातवें भाग को छोड़ता है, अर्थात् उतनी कृष्टियाँ उदयको प्राप्त नहीं होती है, किन्तु अधस्तन बहुभागप्रमाण कृष्टियोका वेदन करता है । तथा अधस्तनवर्ती और प्रथम समयमे उदयको नही प्राप्त हुई कृष्टियोके असंख्यातवें प्रतिभागप्रमाण अपूर्व कृष्टियोका सम्यक् प्रकारसे स्पर्श या वेदन करता है, अर्थात् उतनी कृष्टियाँ उदयको प्राप्त होती हैं । इस प्रकारसे यह क्रम चरमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक संयत होनेतक जारी रहता है । चरमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तमात्र है । नाम और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध सोलह मुहूर्त है | वेदनीयका स्थितिबन्ध चौवीस मुहूर्त है । इसके एक समय पश्चात् सम्पूर्ण मोहनीय कर्म उपशान्त हो जाता है ।। २७९-२८५ ॥ चूर्णिसू० [० - उस समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक वह उपशान्तकपायवीतराग रहता है । तब समस्त उपशान्तकालमें अर्थात् ग्यारहवे गुणस्थानमे अवस्थित परिणाम होता है । उस समय ज्ञानावरणादि कर्मोंका गुणश्रेणीरूप निक्षेप उपशान्तकालके संख्यातवे भागप्रमित आयामवाला है । सम्पूर्ण उपशान्तकालमे किये जानेवाले गुणश्रेणीनिक्षेपरूप आयामसे और अपकर्षण किये जानेवाले प्रदेशाय से भी वह अवस्थित रहता है । प्रथम गुणश्रेणीशीपक के उदय होनेपर उत्कृष्ट प्रदेशोदय होता है । सर्व उपशान्तकालमे केवलज्ञानावरण और केवल - १ आफुददि आस्पृशति वेदयत्यवष्टभ्य गृह्णातीत्यथः । जयध० ८९
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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